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Sunday, 28 October 2007

Grah Shanti Aur Gyan

ग्रह शांति और ज्ञान



--क्या शनि और मंगल ग्रहों का असर होता है? क्या इन के प्रभाव से बचने के लिए पूजा करवानी चाहिए?


किसी को असर करेगा, किसी को नहीं करेगा. ग्रह अपना प्रभाव करते हैं. लेकिन केवल उनपर, जिन पर असर पड़ सकता है.

जैसे एक छोटा बच्चा है, उसे कंकड़ मारोगे तो चोट लगेगी, पर किसी बड़े व्यक्ति को वही कंकड़ मारेंगे तो उसे चोट नहीं लगेगी. वैसे ही, जो व्यक्ति अज्ञान में है उसे असर होगा. लेकिन जो ज्ञान में जाग गया उसे कुछ नहीं होगा.

जो मंगल और शनि से शक्ति में ज़्यादा है, वह उसको कुछ नहीं कर पाएंगे. जो उनसे कमज़ोर है, उस पर ही वह असर करेंगे. असर तो उन पर भी उतना ही होगा जो ज्ञान में हैं, मगर उन पर उसका कोई दुष्प्रभाव नहीं होगा.

ग्रहों की शक्तियाँ ज़रूर हैं पर अगर तुम ज्ञान में आ जाते हो, तो उन के प्रभाव से अधिक शक्तिशाली हो जाते हो.

अगर तुम्हे गाड़ी चलानी अच्छे से आती है, तो तुम खड्डों वाले रास्ते पर भी चला लेते हो और अच्छे रास्ते पर भी चला लेते हो. जिसको मंगल लगा होता है उसके रास्ते में थोडे खड्डे होते हैं, बस. और अगर वह ज्ञान में है, तो वह देख देख के गाड़ी चला लेता है, और आराम से जीवन का रास्ता पार कर लेता है..

पर अगर अंधा गाड़ी चला रहा है तो वह खड्डे में गिरेगा. यही होता है जब लोग अंधविश्वास में ग्रह शांति पूजा पाठ करवाते हैं.

वह पोंगा पंडितों को बुला लेते हैं, ज्ञान को नहीं!

तुम्हें तो केवल आँखें खोलनी हैं. आँखें खोलोगे तो किसी चीज़ का भय ही नहीं होगा.

मंगल भी तुम्हारे भीतर है, शनि भी तुम्हारे भीतर है, गुरु भी तुम्हारे भीतर है, चन्द्रमा और सूर्य भी तुम्हारे भीतर हैं…

इन सब चीजों से क्यों डरते हो? यह सब कुछ नहीं हैं. सब तुम्हारे साथ खेलेंगे, सब तुम्हारे दोस्त बन जाएंगे.

जब तुम जागोगे तो पाओगे की सारी सृष्टि तुम्हारा खिलोना है, और ईश्वर तुम्हारे मित्र…

Sunday, 14 October 2007

Gyaan kaa Dharm

ज्ञान का धर्म


पानी ऊपर से नीचे को बहता है. यही उसका धर्म है. वैसे ही ज्ञान ऊपर से नीचे को ही बहता है...

गुरू हमेशा शिष्य से ऊपर होते हैं- तभी ज्ञान दिया जा सकता है…

दो प्रकार के लोग ज्ञान देते हैं- एक जिन्हे अपनी बात का विश्वास है मगर ज्ञान नहीं है, और दूसरे जो सत्य को जानते हैं. दोनो में बहुत अंतर है.

तुम उसी चीज़ का विश्वास करते हो जो तुम जानते नहीं…

गुरू बनाना, किसी पंथ से जुड़ जाना बहुत आसान है, पर क्या आपने गुरू को प्राप्त किया?

उसके लिए तैयारी चाहिए.

क्या तुम अपने जीवन में बदलाव लाना चाहते हो? क्या तुम सच में जागना चाहते हो?

अभी तो तुम ज्ञान के बिना भी रह सकते हो. ज्ञान की भूख तुम में है ही नहीं.

रामकृष्ण परमहंस के पास एक व्यक्ति आया और बोला, ‘क्या आपने भगवान को देखा है? मुझे दिखा सकते हो?'

रामकृष्ण बोले, ‘हाँ. दिखा सकता हूँ. लेकिन तुम भगवान् देखने आये हो, नहा तो लो. चलो गंगा में डुबकी लगा लो.’

उस व्यक्ती ने डुबकी लगाई और रामकृष्ण ने उसका सर पानी में डूबा कर दबा दिया...

वह तड़पने लगा और ग़ुस्से में बाहर आया. ‘आप इतने बड़े संत हो! आप तो मुझे मार रहे थे!’

रामकृष्ण ने हंसकर उससे पूछा, ‘जब तू डूब रहा था, तब क्या चीज़ कि याद आ रही थी?’

वह बोला- ‘कि मुझे सांस कब मिलेगी!’

रामकृष्ण बोले, ‘जा! जब ऐसी तड़प तुझे ज्ञान की होगी, तभी तुझे भगवान् दिखेगा.’

हम लोग सब उपरी सतह पर जीना चाहते हैं- कैसे मिलेगा भगवान्? कृष्ण ने दुर्योधन की सभा में विश्वरूप दर्शन दिया, पर दुर्योधन को भगवान् नही दिखे. आपके सामने भगवान् आ जाये, आपको नहीं दिखेंगे...

पानी जिस बर्तन में डालो उस रुप का हो जाता है. ज्ञान सबसे निर्मल है. उसको तुम कहीं भी, किसी भी तरफ मोड़ सकते हो. जब तक तुम पवित्र नहीं हुए हो, तुम यह ज्ञान को अपने फ़ायदे के लिए मोड़ लेते हो. गीता पढ़कर चोर चोरी कर सकता है, आतंकवादी आतंक कर सकता है, तुम जो चाहो कर सकते हो…

और वही हो रहा है. फिल्मों मैं गीता के श्लोक लेकर क्या क्या कहानियां बना देते हैं. जब भी कोई मरता है, अखबार में उसकी फोटो के ऊपर नैनं छिन्दंती शास्त्राणि लिख देते हैं…

तुम्हारे शरीर का क्या धर्म है? बूढा होना और फिर ख़त्म हो जाना. हम शरीर को बूढा होने से रोकना चाहते हैं. शरीर के धर्म को तोड़ा मरोड़ा जा रहा है. धर्म संस्थापनार्थाय सम्भावामी युगे युगे. चाहे एक साल बाद, एक सौ साल बाद, या एक हज़ार साल बाद - इस शरीर को जाना ही है.

पानी का धर्म होता है नीचे जाना, आग का धर्म होता है ऊपर जाना. हमारा धर्म क्या है, अधर्म क्या है, इसे हम जानते ही नहीं.

‘शरीर अमर है’ इस भाव लेकर ध्यान में बैठना अज्ञान है.

क्या आप अपना धर्म पूरी तरह निभा रहे हो? अगर नहीं निभा रहे हो, तो वहाँ सम्भावामी युगे युगे होगा. बहुत ज़ोर का थप्पड़ पड़ेगा.

जैसे कुछ बच्चे, जिनको माँ बाप ने बहुत लाड़ प्यार देकर बड़ा किया हो बिगाड़ जाते हैं और जैसे वह बड़े होते हैं, उन्हें संसार में बहुत कष्ट होते हैं. लोग मज़ाक उड़ाते हैं. वही उनका सम्भावामी युगे युगे होता है…

ऐसा नही है कि अचानक एक दिन सफ़ेद कपडे पहनकर, सफ़ेद घोड़े पर सवार होकर, कल्कि अवतार आपके आस पास दौड़ेंगे. कल्कि मने क्या? जो अश्व पर सवार है. ‘श्व’ संस्कृत में ‘कल’ को बोलते हैं. अश्व मतलब जहाँ कल नहीं, जो अब में रहता है. जो वर्त्तमान में रहता है और ज्ञान कि तलवार से भूत और भविष्य को काटता हुआ जीवन व्यापन करता है. जो कोई रंग मे नहीं रंगा है. श्वेत है. अगर तुम वैसे हो जाओ तो तुम भी कल्कि हो…

कुरुक्षेत्र मतलब तुम्हारा मन. कौरव हैं इन्द्रीय भोग. पांडव मने पांच इन्द्रियां और कृष्ण मने आत्मा है.

मन बाहर की ओर मुड़ा है. उसको अन्दर मोड़ना है. इन्द्रियां जब इन्द्रीय भोग से हट जाती हैं तब संसार अपने आप विलुप्त हो जाता है.

रथ क्या है? रथ शरीर है, उसमे आत्मा सारथी है. अर्जुन सजगता है. कहाँ है मेरी सजगता? किन भोगों में? उसको अन्दर मोड़ना पड़ेगा.

कृष्ण आत्मा हैं. आप आँखें बंद करते हो- फिर भी आपका मन बाहरी संसार में भागता है, हमारी आत्मा का संसार इतना सुन्दर है, आनंद दायक है, वह आपको खींच लेगा- उसकी तरफ मन मोड़ना सीखना है. फिर तुम युद्ध जीत गए. यही गीता है…

गीता को एक किताब ही समझ कर लोग उसकी पूजा करते हैं. ऐसी अंधी भक्ती का कोई फायदा नहीं- यह ईश्वर की वाणी है, श्रद्धा से इसे पढ़ो, पूजा भाव में पढ़ो, मगर उसको एक पूजनीय वस्तु मानकर एक जगह पर संभाल रख दोगे तो कोई फायदा नहीं…

बाहरी पूजा एक खेल है. गुरु भी खेल है. ज्ञान भी खेल है. अज्ञान भी खेल है. यह जानते हुए खेल खेलते रहो…

भीतर से तुम स्थिर और शांत हो जाओ...

Saturday, 13 October 2007

Gyaan pipaasaa

ज्ञान पिपासा



गहरा ज्ञान प्राप्त करने के लिए तैयारी चाहिए. कच्चे घड़े में पानी डालोगे तो वह गल जाएगा, उसको आग में तपाना पड़ता है.

घड़ा मज़बूत होने पर ही वह पानी पकडता है. वैसे ही ज्ञान को अपने अन्दर समेटने के लिए साधना करनी पडेगी, तपस्या करनी पडेगी.

ज्ञान को धारण करने की क्षमता ध्यान, साधना, सेवा, चिन्तन, और संतों की संगत में रह कर बढती है…

तुम जिस वस्तु से बहुत प्यार करते हो, उसे बहुत संभाल कर रखते हो- है ना? जैसे भगवद गीता को लोग रेशम के कपडे में लपेट कर इज़्ज़त से रखते हैं. लेकिन उपन्यास या अखबार को ऐसे ही रख देते हैं. इन्हें तो लोग बाथरूम में भी ले जाते हैं!

साधना की और ज्ञान कि बहुत इज़्ज़त करनी चाहिए. अगर तुम ज्ञान की इज़्ज़त नहीं करोगे, ज्ञान तुम्हारी इज़्ज़त नहीं करेगा.

अपने भीतर ज्ञान पिपासा जगाओ. तब जाकर गहराई में उतर पाओगे.

फिर तो ऐसा होगा कि एक छोटी सी बात भी तुम्हारी अंतरात्मा को छू जाएगी.

कोई तुम्हारे सामने कुछ भी कह देगा और उसमे से ज्ञान प्रकट हो जाएगा…

साधारण बातों से तुम्हे गहरे ज्ञान का बोध हो जाएगा…

Asangoham

असंगोहम्



असंगोहम् का क्या अर्थ है?

यह संसार में तुम किसी न किसी चीज़ से जुडे हो.

जब तुम किसी चीज़ के संग हो जाते हो तब तुम कहते हो कि में बूढा हूँ, जवान हूँ, माँ हूँ, बाप हूँ, लम्बा हूँ, पतला हूँ, अमीर हूँ, गरीब हूँ…

यह हमारा स्वभाव है, किसी न किसी चीज़ के संग हो जाते हैं…

शंकराचार्य कहते हैं, असंगोहम्. मैं असंग हूँ. मेरी शुद्ध चेतना किसी चीज़ के संग नहीं है, किसी चीज़ से जुडी नहीं है, मैं असंग हूँ.

असंगोहम्. जैसे जैसे मैं गहराई में उतरता हूँ, मैं पाता हूँ कि मैं यह भी नहीं हूँ, मैं वह भी नहीं हूँ. मैं कुछ भी नहीं हूँ…

नित्य शुद्ध विमुक्तोहम्. मैं नित्य हूँ, मैं शुद्ध हूँ, मैं मुक्त हूँ...

असंगोहम् असंगोहम् असंगोहम् पुन: पुन:. बार बार मुझे यह बात को जानना है.

असंग भाव को याद करते करते, हर एक चीज़ से अलग हो जाना. और जब संसार में वापस आओ, तो फिर असंग हो जाना- बार बार, पुन: पुन:…

मुझे कुछ भी नहीं छू सकता, मैं किसी भाव में लिप्त नहीं हूँ, मैं किसी वस्तु के साथ उलझा नहीं. मैं किसी चीज़ के संग नहीं…

असंगोहम्, असंगोहम्, असंगोहम्, पुन: पुन:...

Thursday, 11 October 2007

Praana, Tej aur Oj

प्राण, तेज और ओज


हमारे शरीर की एक प्रकृती है और उस प्रकृति से जब हम हट जाते हैं उसे विकृति कहते हैं.

शरीर और मन की स्वाभाविक और संतुलित स्थिति को प्रकृति कह सकते हैं.

हमारी प्रकृति बदलती नही है. पर उस प्रकृती में विकृतियाँ आती हैं.

जैसे गलत भोजन करने से हमारे शरीर में विकृति आती है. पुराना खा लिया, जला हुआ खा लिया, सदा हुआ खा लिया. इन सबसे प्रकृति में फेर बदल आते हैं. भोजन के अलावा बहुत सी अलग अलग चीजों से हमारी प्रकृति में विकृतियाँ आती हैं.

अगर हम जान लें कि क्या आहार से शरीर और मन पर क्या प्रभाव पढता है तो प्रकृति में विकृति को कम किया जा सकता है. और धीरे धीरे हम अपनी स्वाभाविक प्रकृति की ओर बढ़ सकते हैं. यह ज्ञान आयुर्वेद का एक भाग है.

प्रकृति में आने से संतुलन आता है. और जब आपका मन, आपका शरीर और आप के आसपास का संसार आपकी प्रकृति के साथ हो, तो आपकी चेतना में एक लय और संतुलन बनने लगता है. यह संतुलन, यह लय में जीने से हमारा जीवन स्वस्थ हो जाता है.

प्रकृति नहीं बदलती है. इसमे विकृतियाँ आ जाती हैं. विकृति को हम तीन दोषों द्वारा जानते हैं- वात, पित्त और कफ.

वात, वायु से, पित्त अग्नी से, और mucous या lubrication से सम्बंधित है. वात, पित्त और कफ के असंतुलन का हमारे शरीर और मन पर असर होता है.

जब हमारे शरीर और मन में संतुलन बनता है तो हम सत्त्व गुण में होते हैं और जब उनमें असंतुलन होता है तब हम राजस या तमस में होते हैं.

सत्त्व, राजस और तमस गुण बदलते रहते हैं, और इनके प्रभाव से लोग अलग अलग भाव में दिखते हैं. कोई सात्त्विक है, कोई राजसिक है, कोई तामसिक है, ऐसा कहना गलत है.

विकृति के कारण कभी कभी प्रकृति दिखती ही नही. आपकी विकृति इतनी बढ़ जाती है कि प्रकृति की जगह विकृति ही दिखती है.

मन जब अपनी प्रकृति में आ जाता है तो आपके विचार शुद्ध होने लगते हैं. और चेतना शुद्ध रुप में प्रकट होती है.

तो यह समझते हुए जीवन व्यापन करना चाहिए.

जब वात संतुलन में आता है तो प्राणशक्ति बढ़ती है. जब पित्त संतुलित होता है तब तेज बढ़ता है. और जब कफ संतुलन में आता है तो ओज बढ़ता है.

प्राणशक्ति बढने से शरीर में स्फूर्ति आती है. तेज बढने से शरीर में एक चमक आती है, और ओज बढने से हमारे शरीर में बिमारी नही आती.

वात के साथ मन का संबंध है. जब वात संतुलित होने लगता है तो प्राणशक्ति बढ़ती है, और हमारा मन शांत होने लगता है.

पित्त के साथ हमारी पाचन शक्ति जुडी है. हमारा पित्त ठीक होने लगता है तो हमारा हाज़मा ठीक होने लगता है, और हमारी बुद्धी संतुलन में आती है. क्रोध कम होने लगता है.

कफ संतुलित होने से स्मरण शक्ति बढ़ती है और ओज बढने से बीमारियाँ हम को चू भी नहीं सकतीं. हमारा शरीर लचकदार हो जाता है।

प्रान, तेज और ओज हम सब में है. इनकी मात्रा बढाने के लिए, सही आहार, सही प्राणायाम, और सही योग साधना ज़रूरी है…

जो साधना करते हैं उनमे जीवन्तता, vitality दिखती है, वह प्राण शक्ति के कारण है. उनके शरीर के आसपास आपको एक चमक सी दिखेगी, वह उनका तेज है. उनमें बिमारी नहीं आती, वह ओज के कारण है…

Tuesday, 9 October 2007

Hamara Asli Swaroop

हमारा असली स्वरूप




Q: हमारा असली स्वरूप क्या है?

A: वह तो हमें ही ढूंढ़ना है.

'मैं कौन हूँ?', इस चिन्तन में रहकर ढूंढ़ना है.

मेरी सजगता किस चीज़ पर है? क्या मैं केवल शारीर हूँ?

यह शरीर बार बार मरता है, बार बार जन्म लेता है. पर क्या यही हमारा जन्म- मृत्यु का खेल है?

क्षण प्रतिक्षण पुनर्जन्म होता है.

जब आप इस कमरे में आ गए तो शिष्य हो गए. कमरे के बाहर आप गाड़ी के driver बन जाओगे या passenger बन जाओगे. जब तक आप इस कमरे में हो तब तक आप सब शिष्य हो, उसमे ना कोई पुरुष है, ना कोई महिला है, ना कोई बड़ा है, ना कोई छोटा है.

वह सब चीजों के कोई मायने नहीं हैं.

तो यहाँ जन्म किसका हो गया? शिष्य का. बाहर निकलने के बाद तुम्हारे कोई और स्वरूप का जन्म हो जाएगा.

तुम्हारा रुप क्षण प्रतिक्षण बदलता है. रूप बदलते हैं, पर स्वरूप नहीं बदलता...

अस्ति, भाती, प्रीति, नाम, रुप. यह पांच लक्षण हैं जीव के…

अस्ति- होना

भाती- महसूस होना

प्रीति- प्रेम करना और पाना

नाम और रुप- दोनो इस संसार के हैं, वही बदलते रहते हैं.

नाम भी बदलता है, रुप भी बदलता है. अस्ति, भाती और प्रीति नही बदलते...

मैं हूँ, मैं जानता हूँ कि मैं हूँ, और मैं जानता हूँ कि मेरा स्वरूप प्रेम है. यह तीन नहीं बदलते - पर यह याद नहीं रहती क्योंकि हम नाम रूप में फँस जाते है.

नाम और रुप एक आवरण है, एक covering है- इसको जानते हुए अस्ति,भाती और प्रीति के साथ जुडे रहना सीखो. यही ज्ञान है...

और अज्ञान माने क्या? अस्ति, भाती और प्रीति को भूलते हुए नाम और रुप में फँस जाना.

स्वर्ग माने क्या? अस्ति,भाती और प्रीति में रहते हुए नाम और रूप के साथ खेलते रहना.

नरक माने क्या? अस्ति भाती और प्रीति को भूल के नाम और रुप में जीवन बिताना.

'मैं हूँ' - अस्ति.यह सत है

हमें पता है कि हम हैं- भाती- इसे चित कहते है.

और प्रीती- हम जान रहे हैं कि हमारा सच्चा स्वरूप प्रेम है- आनंद है...

अस्ति, भाती और प्रीति- सत, चित और आनंद- सच्चिदानंद...

हम अपने इस स्वरूप को भूल जाते हैं जब नाम रूप में फँस जाते हैं...

क्या मैं नही हूँ- इसे ढूँढो...

जो इसे जान रहा है, जो नहीं बदल रहा है- उस के साथ हो जाओ...

यही मोक्ष का द्वार है...

Monday, 8 October 2007

Shiv

शिव




शिव आनंद और ज्ञान स्वरूप है।

सृष्टी केवल शक्ति नही है।

शक्ति ज्ञान का व्यक्त रुप है

जो अव्यक्त से

धर्म से प्रकट होती है।

यही शिव शक्ति का नृत्य है।

दोनो का लास्य

पुरुष और प्रकृति कि अभिव्यक्ति है…

Satya Kya Hai

सत्य क्या है




बाल्टी के साथ रस्सी बंधी है. कूएँ में डाली है. रस्सी काटोगे नहीं तो बाल्टी डूबेगी नहीं.

तुम्हारा ध्यान इसलिये अधूरा है क्योंकि तुम संसार को पीछे छोड़ते नहीं...

ध्यान के बाद कि planning करके ही बैठते हो. सारे commitments zero करके बैठते ही नही.

चेतना में कोई ना कोई बीज पड़े रहते हैं.

कहाँ कहाँ रस्सी बाँध रखी है.

ज्ञान से वासनाओं के बीज जल जायेंगे.

किसी चीज़ के बारे में जानना और किसी चीज़ को जानना अलग है.

बिना शब्दों के ‘मैं कौन हूँ’ इसको जानो और फिर बिना शब्दों के संसार देखो.

मैं कहाँ कहाँ फंसा है.

ध्यान में सजगता नहीं है.

अभी विवेक ही नहीं जागा. पहले रस्सी को काटना है कि ‘यह सब सच है’.

शब्द और मतलब को छोडो. जो इसको जान रहा है, उसकी ओर ध्यान दो…

Saturday, 4 August 2007

Suswaagatam


सुस्वागतम्


आत्मीय,

तुम्हारा अपने घर में स्वागत है...

मैं किसी विषय पर ज़्यादा तो नहीं जानता पर अपने अनुभव तुम्हारे साथ बाँट रहा हूँ...

मैंने तुम में एक सह पथिक पाया है जो आम से अलग सोच रखता है और अपने जीवन की राह खोज रहा है...

आओ, तुम और मैं साथ मिलकर इस धरती को स्वर्ग बनाएं...

साथ साथ हम अनजानी राहों पर चलें और नयी दिशाएं ढूंडें …

तुम्हारा हमक़दम,

दीपम्