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Wednesday, 20 May 2009

एक अनोखी भेंटवार्ता- ४

एक अनोखी भेंटवार्ता- ४

सफ़र के करीब दो घंटे बीत चुके थे और व्यक्ति को लगा कि यह वार्ता लम्बी चलेगी. वह मन ही मन मुस्कुरा रहा था. उसे यह समझ आ गया था कि लड़की की पूछताछ और जिज्ञासा उसके धर्म को हिंदू धर्म से ऊंचा साबित करने के लिए नहीं थी. लड़की में ख़ुद को जानने कि प्रबल इच्छा मालूम हो रही थी.
व्यक्ति जानता था कि धर्म और दुनियादारी की बातें बेकार के तर्कों को बढ़ावा देती हैं और किसी के कोई काम की नहीं होतीं. लड़की का प्रश्न ऐसा था जिसका जवाब इस वार्तालाप को एक नयी दिशा दे सकता था- जो बातचीत को धार्मिक बातों से परे, आध्यात्मिक बातों की ओर ले जा सकता था और लड़की को अपनेआप को जानने में मदद कर सकता था.
वह बोला, 'कर्म का सीधा सीधा मतलब होता है कोई भी कार्य (Action). जब हम कुछ भी काम करते हैं तो उसका असर (Effect) होता है. इसे हम कर्म और कर्मफल (Karma/Cause/Action and Fruit of Karma/Effect/Reaction) कह सकते हैं. यह कोई धार्मिक बात नहीं है बल्कि सरल सत्य है जो हमें रोज़ अपनी ज़िन्दगी में दिखता है.
मैं आपको एक उदाहरण देता हूँ. किसी बागीचे में हम बीज बोते हैं, उन्हें पानी से सींचते हैं, तो पौधे उगते हैं. मगर हर बीज से वही पौधा उगेगा जिसका बीज बोया गया हो. अगर आपने आम का पेड़ लगाया है तो उसमे संतरे तो नहीं उगेंगे, है कि नहीं?!'
'जी बिलकुल' लड़की बोली.
व्यक्ति आगे बोला, 'ठीक इसी प्रकार हमारे हर कर्मों (Actions) को बीज माना जा सकता है, और उनके असर (Effects) को कर्मफल (Fruits of Karma) माना जा सकता है.'
लड़की व्यक्ति की बात ध्यान से सुन रही थी.
व्यक्ति ने आगे कहा, 'मगर इसका एक और पहलू है. जैसे अलग अलग पौधों के बीज अगर एक समय पर भी बोए जाएँ, और पानी से सींचें जाएँ, फिर भी सब अपने अपने समय से ही बड़े होते हैं और अलग अलग समय पर फलते फूलते हैं; उसी प्रकार हमारे कर्म भी अलग अलग समय पर फलते हैं.'
'वो कैसे?'
'कर्मफल तीन प्रकार के होते हैं- पहले, ऐसे कर्म जिनका असर एकदम होता है- जैसे अगर आप अपना हाथ आग में डालोगे तो एकदम गर्मी लगेगी और जल जाएगा. दूसरे, वैसे कर्म जिनका असर कुछ समय के बाद होता है, जैसे अगर आपने थोड़ा बासी खाना खा लिया हो तो कुछ समय बाद पेट में दर्द होगा. और तीसरे, वह कर्म जिनका असर बहुत समय के बाद होता है- जैसे किसी इंसान ने किसी एच आई वी+ (HIV+) व्यक्ति के साथ यौन सम्बंध बनाए और बहुत साल बाद एड्स (AIDS) का शिकार हो गया.
हमारे जीवन में बहुत सी परिस्थितियाँ आती हैं जिन्हें हम समझ नहीं पाते, और भगवान को या परिस्थितियों को दोष देते हैं. लेकिन अगर हम Karma Theory कोसमझ लें तो अधिकतर प्रश्नों का बड़ी आसानी से निवारण हो जाता है.'
लड़की सोच में पड़ गयी थी. वह व्यक्ति की बातों से प्रभावित हो रही थी. वह इन बातों के द्वारा अपने जीवन की घटनाओं को समझने की कोशिश कर रही थी.
'मगर क्या आपकी Karma Theory मुझे यह बता सकती है कि कोई अमीर और कोई ग़रीब, कोई स्वस्थ और कोई बीमार क्यों पैदा होते हैं? किसी बच्चे को माँ-बाप का गहरा प्रेम और किसीको अपने माँ-बाप का प्यार क्यों नहीं मिलता?' बोलते बोलते, लड़की की आँखें भर आईं और उसकी आवाज़ कांपने लगी.
व्यक्ति समझ गया कि उसने लड़की की दुखती रग पर हाथ रख दिया था. कुछ देर तक उसने कुछ नहीं कहा. फिर वह धीरे से बोला, 'हिन्दू धर्म में यह मान्यता है कि हम केवल एक ही शरीर में जीवन को पूरी तरह नहीं समझ सकते, इसलिए, हमें कई बार जन्म लेना पड़ता है. आत्मा शरीर बदलती रहती है और अमर है. वही कर्म और कर्मफल भोगती है. कुछ कर्मों का भोग हमें अपने अगले जन्मों में करना पड़ेगा- और कुछ ऐसे कर्म जो हमने पिछले जन्मों में किये होंगे, उनका भोग हमें इस जन्म में करना पड़ रहा है.
अगर आपके जीवन में कोई ऐसी शारीरिक या मानसिक पीड़ा आई हो, जिसका कोई कारण आप नहीं समझ पा रहीं हैं, तो हिंदू धर्म के अनुसार, वह किसी पिछले जन्म के कर्म का फल है. लेकिन साथ ही साथ यह भी जानना उचित है कि पीड़ादायक कर्म फल किसी पाप (Sin) के कारण नहीं हैं और भगवान किसी को दंड (punishment) नहीं दे रहे.
हिंदू मान्यता के अनुसार, स्वर्ग-नर्क (Heaven and Hell) भोग केवल अपने कर्म के अच्छे और बुरे फल ही हैं, और कुछ भी नहीं.'
लड़की ने कुछ सोच कर कहा, 'इसका मतलब आप हिंदू तो भगवन में कोई विश्वास ही नहीं करते! जब सब कुछ अपने ही हाथ में है- तो भगवान कि ज़रुरत ही नहीं जान पड़ती है!'
व्यक्ति बोला, 'ऐसा नहीं है, भगवान तो श्रद्धा की बात है. इसीलिए हिंदू धर्म में इश्वर को सगुण साकार 'एवं' निर्गुण निराकार दोनों ही कहा गया है.'
'तो आपका कहना है की मेरे जीवन में जो कुछ हुआ है और हो रहा है, उसका कारण मेरे ही कर्म हैं? और ईश्वर का उसमे कोई हाथ नहीं? इसका मतलब तो यह हुआ की ईश्वर से अपने पापों के लिए माफी मांगने से (Asking for forgiveness for one's sins) आपके पाप कभी नहीं धुलेंगे!
हमारा धर्म तो कहता है की जीज़स हमारे पापों के लिए सूली चढ़े थे. और अगर हम कोई भी गलत काम करते हैं, और हमें उसके लिए पश्चात्ताप होता है, तो हम उनसे माफ़ी मांग कर मुक्त हो सकते हैं. इसका मतलब तो यही हुआ कि आपके हिंदू धर्म में मुक्त होने का कोई रास्ता ही नहीं है!'
व्यक्ति मुस्कुराकर सर हिलाने लगा और कुछ देर के लिए चुप हो गया. यही बात उसने कितने ही पाश्चात्य धर्म के अनुयायियों के मुख से सुनी थी. इसी बात को लेकर वे सब हिंदू धर्म का विरोध करते हैं.
'हिंदू धर्म में इश्वर मनुष्य कि पूरी पूरी देखभाल करते हैं। मनुष्य अगर अपने पापों का प्रायश्चित्त करे तो भगवान उस पर मेहर (Grace) बरसा देते हैं.
मगर, जैसे अगर कोई बच्चे ने अगर गलती कि हो और माफ़ी मांग ले, तो उसकी गलती कम नहीं हो जाती. उसे गलती का एहसास होने के लिए दंड भोगना ज़रूरी होता है. उसी प्रकार, हमें अपने कर्मों के फल भोगने ही पड़ते हैं. बारिश में कोई भीग रहा हो, और भगवान से बचाव कि प्रार्थना करे, तो भगवान उसे मेहर और ज्ञान की छतरी दे देंगे, मगर बरसात को रोकेंगे नहीं!
वैसे ही कर्म फल की 'बरसात' से बचने के लिए, ज्ञान और साधना कि 'छतरी' का सहारा लेना चाहिए. माफ़ी मांगने (Praying for Forgiveness) से अंहकार (Ego) और ग्लानि (Guilt) कम होती है.
लड़की बोली, 'मगर आप एक ही ईश्वर पर क्यों विश्वास नहीं करते?
(क्रमशः)

Sunday, 28 October 2007

Dharm kaa khel

धर्म का खेल



धर्म को खेल मानते हुए निभाओ. यह जानते हुए की सब बनावटी है, कुछ सच नही है, धर्म का खेल खेलो.

जैसे छोटे बच्चे खेल में खाना बनाके माँ के पास लाते हैं और माँ बोलती है ‘अरे वाह ! क्या बढ़िया खाना बनाया’, और उसको बड़े चाव से खाने का नाटक करती है. उसको पता है की यह सच नहीं है पर बच्चे के साथ खेल खेलती है. बच्चे के खेल का धर्म निभा रही है क्योंकि बच्चे को मज़ा आ रहा है.

वैसे ही तुम्हे खेल खेलना है. कुछ धर्म निभाना है. यह ज्ञान के साथ कि कुछ सच नहीं है, और तुम उस से बहुत विशाल हो. लेकिन तुम अपने स्वरूप की विशालता को जानते हुए समय, काल, और देश के धर्म की मर्यादा रखते हुए उसके साथ चलो.

तुम तो निर्मल हो- तुम्हे तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा की तुम यह धर्म निभाओ या कोई और धर्म निभाओ. जहाँ पर तुम हो वहाँ के धर्म में तुम ढल जाओगे.

एक actor हर महीने एक नया नाटक खेलता है, ज़िंदगी में १००-२०० नाटक खेलेगा. पर वह खुद बदलता है क्या? नाटक खेल रहा है, पर वह नाटक का किरदार नहीं बन जाता है. नाटक में दी गयी पंक्तियाँ बोलता है, और नाटक का धर्म निभाता है. वैसे ही तुम जीवन में अपना धर्म निभाते जाओ.

जब तक तुम सब कुछ सच मान रहे हो तब तक उसे छोड़ने में तुम्हे भय होता है, क्रोध आता है.

यानी कि वह तुम्हारे लिए बन्धन है. जब भी अपने आप को संसार से बांधने वाले कर्म करते हो तुम में अकड़ आ जाती है. और जब किसी चीज़ में अकड़ आ गयी, तो वह सूख जाती है, खत्म हो जाती है. कोई लाश को कभी कोमल देखा है क्या?

ज़िंदगी वहाँ है जहाँ लचीलापन है, और तुम्हारा मन कुछ भी करने को तैयार है.

जैसे ही अकड़ आ गई, ‘क्यों करूं?’ यह भाव आ गया, तो सख्तपन आगया. फिर सोचो वह मरने लगा, उसकी चेतना मरने लगी.

जिंदगी में अकड़ नहीं लचीलापन होना चाहिये. मस्ती से जिंदगी का खेल खेलो, और सुखी हो जाओ...

Thursday, 25 October 2007

Teen Maalii

तीन माली


एक बहुत अच्छा राजा था. उस राजा के पास एक बहुत सुन्दर और बहुत बड़ा बागीचा था. उस बागीचे का एक कोना जंगल के साथ लगा हुआ था.

राजा और रानी बागीचे मैं घूमा करते थे. तीन माली उनके बागीचे की देखभाल करते थे.

एक दिन, राजा रानी बागीचे में टहल रहे थे. राजा रानी बात करते हुए मस्ती में घूम रहे थे. अचानक राजा का महामंत्री दौड़ा, दौड़ा आया, उसे राजा को कोई बहुत ज़रूरी बात बतानी थी. उनकी बात कुछ लंबी होने लगी, तो राजा ने रानी से कहा ‘तुम अगर चाहो तो थोड़ा आगे चली जाओ, मैं इनसे बात कर लेता हूँ, फिर मैं तुम्हारे साथ हो लूंगा.’

रानी बोली ‘ठीक है आप जैसा कहें.’ रानी टहलती हुई दूर निकल गयी और बागीचे के आख़िर तक पहुंच गयी.

तीनों माली जंगल के पास ही काम कर रहे थे. अचानक, जब रानी वहाँ पहुँची, एक बहुत बड़ा शेर दहाड़ता हुआ, रानी की ओर झपटा. तब तीनों माली दौड़कर आये और शोर मचाने लगे. उन्होंने डंडे लेकर उस शेर को डराया तो वह भाग गया.

रानी मालियों की वजह से बच गयी. वह काफ़ी डरी हुई थी. वह तीनों मालियों को साथ लेकर वापस पहुँची और राजा को सब कुछ बताया.

राजा मालियों से बोले, ‘बहुत अच्छा काम किया आप तीनों ने. मैं आपका आभारी हूँ. मंत्रीजी, इन्हें मुंहमांगा इनाम दीजिये’

मंत्री ने उनसे पूछा, तो एक माली मुस्कुराता हुआ बोला, ‘रहने दीजिये, हमने तो अपना कर्तव्य निभाया.’

राजा बोले ‘फिर भी, कुछ तो बोलो क्या चाहिए? हम तुम्हारी हर इच्छा पूरी करेंगे.’

माली बोला, ‘राजाजी, अगर आप देना ही चाहते हो, तो मुझे एक ही चीज़ चाहिए- मैं एक दिन के लिए इस देश का राजा बनना चाहता हूँ.’

हँसते हुए राजा बोले, ‘बस इतनी सी बात? ठीक है, एक दिन के लिए तुम इस देश का कार्यभार संभाल लेना.’

दूसरे माली ने इनकी बातें सुन ली थीं. जब उस से पूछा गया, तो उसने बोला, ‘राजाजी, मुझ को भी एक दिन का राजा बनना है.’ राजा बोले ‘ठीक है.’

तीसरा भी पीछे क्यों रहता. उसने भी वही बोला, ‘मैं भी एक दिन के लिए राजा बनना चाहता हूँ.’

राजा हंसकर बोले ‘भाई ठीक है, तीनों को एक, एक दिन के लिए राजा बना देते हैं, और हम घूमने चले जाते हैं.’

सबको बता दिया गया कि राजा ने आज्ञा दी है कि यह तीनों माली एक एक दिन के लिए राजा बनेंगे और सबको इनका कहा मानना पड़ेगा। राजा ने मंत्री को आज्ञा दी की जब हर माली का राजकार्य समाप्त हो तो उनको कोई धन देकर घर भेजा जाये।

पहले दिन पहला माली आया, मंत्री उसको बोले, ‘आप महाराज हैं, आज आपका दिन है, आप जो चाहे कर सकते हैं.’ उस माली ने कहा, ‘मुझे राजगुरुजी के पास ले चलिए.’

वह राजगुरु को प्रणाम करके, बोला ‘गुरुजी, ये दिन मुझे मिला है, आप बताइये मुझे क्या करना चाहिए?’ राजगुरु थोड़ी देर सोचकर बोले, ‘गरीबों को कुछ दान दे दो, अच्छा रहेगा.’

तो पहला माली बोला, 'महामंत्रीजी सब गरीबों को जैसा आप ठीक समझते हैं, धन सम्पत्ति का दान दीजिये. मैं यहीं रहूँगा.'

फिर वह गुरुजी को बोला ‘गुरुजी, मैं आपके पास दिन काटने के लिए जीवन भर तरसता रहा. मुझे यह मौका मिला, तो आपसे मिलने का रास्ता मिल गया. आज सारे दिन मैं आप के समीप बैठकर ज्ञान पाना चाहता हूँ.’

गुरु उसको ज्ञान और धर्म की बातें बताने लगे. शाम को महामंत्री वापस आए और इस माली को कहा, ‘आज का राज काज अच्छे से गुज़र गया है. अब आपका कार्य समाप्त हुआ.'

गुरु ने कहा, ‘लेकिन मेरा कार्य अभी बाक़ी है. बेटा तुम में लगन है. तुम आज से मेरे शिष्य हुए. जो तुमने राजा बनकर पाया है, वह तुम अब साधारण माली होकर भी पाओगे. तुम जब चाहो यहाँ बिना रोक टोक आ जा सकते हो.’

मंत्री ने राजा की आज्ञानुसार पहले माली को कुछ धन देना चाहा, तो उसने इनकार किया, ‘मुझे तो मेरा धन मिल गया है. इस धन को भी गरीबों में बाँट दीजिये.’ और पहला माली ख़ुशी ख़ुशी अपने घर चला गया.

अगला दिन हुआ, अगला माली आया, मंत्री बोले, ‘आज आप राजा हैं, तो आप बताइये आप क्या करना चाहेंगे?’ उसने पूछा, ‘कल क्या हुआ?’ मंत्री बोले, ‘कल हम लोगों ने गरीबों में धन बांटा.’

दूसरा माली बोला, ‘अच्छा है. वही चलने दीजिये, हम खुद जाएंगे और सब को धन बाँटेंगे.’ वह एक बार गुरुजी को प्रणाम करके आ गया और वह खुद उस दान कार्य में जुड़ गया. वह मंत्री से हर कार्य से पहले उसके बारे में जानकारी लेकर अपनी सलाह देता - ‘नहीं उनको ये वस्तु दो, ऐसे दो, ये क्यों दे रहे हो?’

वह मंत्री से सब राजपाठ कि बातें करने लगा, और उसने कुछ अच्छे सुझाव भी दिए. उसने बढ़िया भोजन खाया, अपने सारे दोस्तों के साथ मौज मस्ती की. दरबार मैं बैठकर फरियादें सुनीं, सबके साथ खूब बातचीत की, और शाम को जब उसका दिन ख़त्म हुआ, तो मंत्री ने उसे कुछ धन दिया, और राजनीति सीखने का आमंत्रण भी दिया. और दूसरा माली भी ख़ुशी ख़ुशी अपने घर चला गया।

तीसरा दिन हुआ. तीसरा माली आया. फिर मंत्री बोले, ‘आज आप राजा हैं, तो आप बताइये आप क्या चाहते हैं?’ तीसरा माली थोड़ा चतुर था. बोला, ‘हम आज राजा हैं, हमारी रानियाँ कहाँ हैं?’

मंत्री बोले, ‘पटरानी तो राजाजी के साथ गयी हैं, लेकिन राजा की तीन और रानियाँ हैं.’ तीसरा माली बोला, ‘अच्छा है. हम आज रानियों के साथ रहेंगे.’

अब मंत्री तो मंत्री होते हैं. उसने भी सोचा कि कैसे यह दिन बिना रोक टोक निकल जाये.

मंत्री ने कहा, ‘जैसी आप कि आज्ञा राजाजी. आप राजा हैं, आप जो चाहे कर सकते हैं.

लेकिन आप माली का काम करते हैं इसलिए आपका शरीर थोड़ा कड़ा है. रानियाँ बहुत कोमल हैं, वह तो महलों में बड़ी हुई हैं, वह आपके साथ अभी इस स्थिती मैं नहीं रह पायेंगी.

ऐसा करते हैं, पहले मैं आपको चंदन का लेप लगवाकर गुलाबजल से नहलवा देता हूँ, मालिश करवा देता हूँ, आपकी दाढ़ी बनवा देता हूँ, बाल कटवा देता हूँ, manicure, pedicure करवा देता हूँ, foot massage, head massage, सब कुछ करवा देता हूँ.

और तब तक मैं रानियों को भी आपके लिए तैयार करवा देता हूँ. कमरे में फूल सजवा देता हूँ. उसके बाद आप बढ़िया पोशाक पहनकर रानियों के पास चलियेगा.’

तीसरा माली बोला, ‘अरे वाह! बहुत बढ़िया plan बनाया है आपने मंत्रीजी.’

फिर क्या था, चंपी वाला, मालिश वाला, accupressure वाला, नाई- सब झट बुला लिए गए. मंत्री ने सबको आज्ञा दी, ‘इन महाशय की ऎसी बढ़िया तरह से मालिश करना कि इनको गहरी नींद आ जाये. और सब कुछ आपको बहुत धीरे धीरे करना है. एक के बाद एक जाना. यह नहीं कि सारे एक साथ उनके पास चले जाओ.’

माली तो रोज़ भारी काम करते हैं- कभी इस माली को ऐसी बढ़िया मालिश जिंदगी में नहीं मिली थी. साथ ही साथ उसे भरपेट मिठाइयां, पकवान और नींद की गोली मिलाकर शरबत भी दे दिया गया. और वह ऐसा सोया कि फिर देर रात तक सोता ही रहा. ८-१० घंटे बीत गए…

राजा रात को वापस आये, और मंत्री ने राजा को सब कुछ बताया.

राजा बोले, ‘देखिए मंत्रीजी, राजा का कर्तव्य है प्रजा की भलाई. इस व्यक्ति को सही रास्ता दिखलाना भी हमारा ही कार्य है. इसको दंड नहीं देना, क्यों कि इसने जो भी चाहा हो, वह उसके हक में था, और आपने बड़ी सूझ बूझ से काम किया कि कुछ ग़लत नही हुआ.

किसी के मन में ग़लत विचार आने से हम उसे दंड नहीं दे सकते हैं. इसको धन देकर, इसके घर भेज देना,मगर पहले इसे कुछ हिदायतें दे देना.

रानीजी को बचाते समय, इसने वीर होने का सबूत दिया था. इसको हम सैनिक बना सकते हैं. बस इसकी वासनाओं की शुद्धि के लिए इसे एक सही शिक्षक चाहिए. राजगुरुजी से पूछकर इसको सही ज्ञान दिलवाइये, और बाद में सेनापति के पास भिजवा दीजिये.’

तीसरा माली देर रात को जब जागा, तो बहुत भयभीत था, कि उसे उसकी बातों के लिए भयंकर दंड दिया जाएगा. मगर जब मंत्रीजी ने राजा का निर्णय बताया, तो वह कृतज्ञ हो गया. धन पाकर, और सेना में भर्ती की बात जानकर वह फूला नहीं समाया. और तीसरा माली भी ख़ुशी ख़ुशी अपने घर चला गया.

कुछ दिनों के बाद राजा ने पहले माली को राजगुरुजी की सेवा में रखवा दिया, दूसरे को मंत्री के साथ राजनीती सीखने और उनका हाथ बंटाने में लगवा दिया, और तीसरे को अपनी सेना में सैनिक बना दिया.

समझने की बात यह है कि तीनों मालियों का वही प्रारब्ध था. लेकिन तीनों में अलग अलग भाव थे, जिनके कारण उन्होने अपने कर्मफल का अलग, अलग भोग किया. पहला माली सत्व गुण में, दूसरा माली राजस गुण में, और तीसरा तामस गुण में थे, और तीनों ने अपने गुणों के अनुरूप ही आगे के लिए नए कर्म बनाए.

हर व्यक्ति के गुण और परिस्थितियाँ जान कर अगर हम उनसे काम लेना सीख लें, तो जीवन में बहुत से कार्य आसान हो जाएंगे…

Monday, 15 October 2007

Karm ke sookshm phal

कर्म के सूक्ष्म फल



कर्म का एक बाहरी असर होता है, एक भीतरी असर होता है.

कर्म का जो असर संसार में होता है, हम उसे ही जानते हैं.

लेकिन बाहरी असर बहुत कम है- समझो १%. कर्म का ९९% असर भीतर, हमारी चेतना पर होता है.

थोड़े दिनों तक कोई कर्म बार बार करने से वह हमारा स्वभाव हो जाता है. हमारी चेतना पर इसका असर हो जाता है.

जैसे तुम्हे सफाई रखना पसंद है- यह संस्कार तुम्हारे अन्दर सालों से बैठ गया है, तो तुम जहाँ जाओगे वहीं सफाई रखोगे.

जब तुम कोई कर्म करते हो, उसका असर मन पर, विचारों पर पड़ता है- इस से संस्कार बनते हैं.

हम लोग बाहरी असर की ही चिंता करते हैं, “यह क्या हुआ? कैसे हुआ?”

तुम यह नहीं जानते, कि तुम्हारी चेतना पर उसका कितना गहरा असर होता है. तुम्हारे सारे भाव वहाँ से उठते हैं, तुम्हारे सारे विचार उसमे से प्रकट होते हैं, तुम्हारे सारे कर्म वहाँ बनते हैं.

जो भी कर्म करो, उसका संसार में प्रकट कर्म फल तो भोगना ही पड़ेगा, लेकिन चेतना पर जो उसका असर होगा, उस पर तुम्हे बहुत ध्यान देना पडेगा.

सेवा में लग जाओ. साधना करो. सत्संग में बैठो.

सेवा से तुम्हारे विचारों और भावों कि शुद्धि होगी. साधना करोगे, तो संस्कार शुद्ध होंगे, वासनायें क्षय होंगी, चेतना निर्मल होगी. सत्संग में ज्ञान जागेगा कि पीड़ादायक कर्म नहीं बनाते हुए कैसे जीवन व्यापन करें. प्रारब्ध कर्म फल भोगने की शक्ति आएगी.

Karm phal

कर्म फल


हम अपनी ग़लत आदतों को छोड़ नही पाते- इस लिए कि छूट ती नहीं.विवशता बढ़ती जाती है और हमें डिप्रेशन में ले जाती है. इस बेबसी से कैसे निकला जाए? मन की शक्ति को कैसे बढ़ाया जाए?

दुनिया के सामने झूठ बोल लेते हो. अपने बारे में अपने आप से झूठ बोल लेते हो कि, “नहीं नहीं, मैं ऐसा कैसे हो सकता हूँ?”

क्यों नहीं हो सकते हो? इसीलिये तुम्हे ग्लानी होती है.

किसने कहा कि तुम्हारे में यह चीज़ें नहीं हो सकती हैं? किसने कहा तुम में लोभ, लालच, क्रोध, या काम वासना नहीं होनी चाहिए?

जिसने ऐसा कहा उसको तुम प्रणाम करके उस से दूर चले जाओ…

पहली बात. जैसे पेड़ हैं, नदियां हैं, पहाड़ हैं, लोग हैं- वैसे ही हमारा मन है. न अच्छा न बुरा- बस है.

वैसे ही तुम्हारी इच्छाएं हैं- न अच्छी हैं, न बुरी हैं. इस भाव को जगाना, इस भाव को शक्तिशाली बनाना।

यह बहुत ज़रूरी है कि तुम आत्म-ग्लानी से दूर हो जाओ. जब तक तुम इस से दूर नहीं जाओगे, तब तक तुम मोक्ष कि सीढ़ी नहीं चढ़ पाओगे.

दूसरी बात. तुम ने किसी ज्ञानी से, किसी पुस्तक से, जान लिया क्या ग़लत है, क्या सही है, अब तुम्हे उस पर मनन करना ज़रूरी है. ‘क्या मैं सही प्रकार से जी रहा हूँ? मुझे लगता है यह अच्छी बात है, और मैं जैसे जीवन जी रहा हूँ, मुझे वैसे नहीं जीना चाहिऐ.’

तीसरी बात.मैं अभी गलतियां कर रहा हूँ, पर मुझे इनके फल भोगने के लिए तैयार रहना पडेगा. क्या मैं तैयार हूँ?

जो कर्म बन रहे हैं, मैं उनको भोगने को तैयार नहीं हूँ- इस लिए मैं द्वेष भाव में हूँ, और react कर रहा हूँ, जिसके कारण नए कर्म बन रहे हैं. लेकिन क्यों कि मैंने ऐसे कर्म किये हैं जिनका बुरा फल मुझ पर आयेगा, तो मुझे उनको भोगना पड़ेगा.

ठीक है, मैं तैयार न भी हूँ, तो भी मुझे भोगना ही है. तो क्यों न उनको मैं स्वीकार करते हुए भोगूँ.

यहाँ से शुरू करेंगे. कि ठीक है, मुझ से जो भी कर्म हो रहा है, मुझे उसका फल स्वीकार है. मैं बुरे कर्म इसलिये नहीं करना चाहता हूँ, क्योंकि मुझे बुरे फल नहीं चाहिए. लेकिन मैं पहले किये कर्मों के फलों को स्वीकार लूँगा.

बिना किसी रोक टोक के, बिना किसी क्रोध के, बिना किसी दुःख के, बिना किसी भय के- जो भी मेरे जीवन में आ रहा है, उसे मैं स्वीकार लूँगा।

यह पहली सीढ़ी है.

इस पर आकर तुम शांति से बैठो- कि ठीक है, मुझ पर कर्म बरस रहे हैं. कोई मुझे बुरा भला कह रहा है, मुझ पर बिमारी आ गयी. अब मैं इन को भोग रहा हूँ. पहली सीढ़ी.

देखो, इसका यह मतलब नहीं कि तुम हाथ पर हाथ रख कर बैठ जाओ. परिस्थितियाँ तुम पर आ रहीं हैं, उनका तुम कैसे सामना करते हो, और तुम्हारा आगे का जीवन कैसा होगा, यह तुम्हारे हाथ में है.

दो बातें हैं. एक कि तुम्हे कर्म करने में पूरी स्वतन्त्रता है- पर कर्म भोग में स्वतन्त्रता नहीं है.

तो कर्म फल को नतमस्तक होकर स्वीकार करो और भोगो, और ज्ञान में रहते हुए कर्म करो जिस से आगे का जीवन सुन्दर बना सको.

फिर दूसरी सीढ़ी. अभी जो मैं कर्म कर रहा हूँ, इनका कैसा फल होगा?

छोटे बच्चों को देखना, जा के बिजली के पॉइंट में उंगली डालेंगे. तुम कितना भी रोको, लेकिन वह डालेंगे ही. जब तक shock नही लगेगा, तब तक वे उंगली डालना बंद नहीं करेंगे. अज्ञानी व्यक्ति कर्म ऐसे ही भोगते हैं. जब तक उनको झटका नहीं लगता, वे समझते ही नहीं.

कर्म के फल का ज्ञान दो प्रकार से होता है. अपने अनुभव से, और दूसरे के अनुभव को देख कर. अपने अनुभव से कर्म फल का ज्ञान साधारण अनुभव है. लेकिन ज्ञानी दूसरे के कर्म फल को जान कर ज्ञान पा लेता है।

हर कर्म फल का ज्ञान तुम्हे सीधे अनुभव से पाना ज़रूरी नहीं है.

दूसरे को देख कर, शास्त्रों में पढ़कर, गुरू से सीख कर, धर्म और कर्म के बारे में जान लेना चाहिए.

तीसरी सीढ़ी. कर्म कैसे बनते हैं, इसका ज्ञान. अज्ञान में कर्म दो कारणों से बनतें हैं- वासनाओं और संस्कारों से.

वासनायें मतलब, हमारे भीतर दबी इच्छाएं. कितने दिनों की, कितने जन्मों की- पता भी नहीं. अचानक कोई चीज़ सामने आती है, और उसकी इच्छा जाग उठती है.

जैसे, कोई व्यक्ति जिसने कभी रसगुल्ला खाया ही नही हो. उसे पता ही नहीं कि उसे रसगुल्ले की इच्छा हो भी सकती है. एक दिन किसी ने रसगुल्ला खिला दिया, और उसे खाने के बाद, वह बार, बार उसके बारे में सोचता है. ‘वह चीज़ बहुत बढ़िया है, मुझे तो वही मिठाई खानी है.’

जब तक खाया नहीं, उसका कुछ पता ही नही था. लेकिन जिस दिन खाया उसके बाद उसकी वासना जाग गयी…

वासनाएं trigger होती है. जैसे कोई बटन दब गया और टेप रिकॉर्डर चालू हो गया. एक बाहरी stimulus की ज़रूरत होती है, वह कोई विशेष परिस्थिती में उभर कर प्रकट हो जाती हैं.

तुम किसी व्यक्ति को देखते हो, और तुम्हे उसको मिलने की, साथ बैठने की, बात करने की इच्छा होती है.

स्विटजरलैंड, जिस का तुम्हे पता ही नही था, उसके बारे में तुम्हे किसी ने बताया, और तुम्हे स्विटजरलैंड देखने की इच्छा होने लगी.

इस तरह तुम्हारे अन्दर वासनाएं बनती जाती हैं.

दूसरी चीज़ है संस्कार. संस्कार हैं तुम्हारी आदतें- जो सुन कर, देख कर, धीरे धीरे कर्म करते करते, बनती हैं.

संस्कार वह भी हैं जो तुम्हे सिखाये गए हैं, जैसे कोई बड़े बुज़ुर्ग को देख, उनके पैर छूना, कोई घर आये तो पानी पिलाना- यह संस्कार हैं. इन से भी कर्म बनते है.

बुरे संस्कार भी पड़े होते हैं. जैसे किसी जगह गए, वहाँ देखा कोई नही है और सामने ५०० रूपए का नोट पड़ा है, झट उठा कर जेब में दाल लिया, और चल दिए. यह बुरा संस्कार है. जैसा किसी का वेश्या के घर जाना. वासना से नहीं, आदत से.

दोनो अलग, अलग चीज़ें हैं।

वासना और संस्कार में अंतर बहुत सूक्ष्म है. एक जो संसार को भोगने की इच्छा से कर्म किया जा रहा है, और दूसरा, जो कर्म तुम अपनी अच्छी या बुरी आदतों के कारण कर रहे हो. कर्म वही होगा. कर्म का फल भी वही होगा. मगर कारण अलग होगा.

जैसे किसी ने जान बूझ कर, अगर ज़हर खाया, तो भी मरेगा, अनजाने में खाया तो भी मरेगा.

कर्म वैसे ही होते हैं. तुम सोचते हो कि मुझे तो मालूम ही नहीं था- और यह कर्म हो गया.

तुम्हे मालूम हो, न हो, कर्म तो कर्म है. तुमने लिफ़्ट में घुस कर आंख बंद करके कोई भी बटन दबा दिया. दसवें माले पर पहुंच गए. अब तुम बोले, “मुझे तो मालूम नहीं, मैं दसवें माले पर कैसे पहुंच गया?!”

तुम अनजाने में कितनी बातें कह देते हो, उनका असर तो होगा ही. उसके फल तो तुम्हे भोगने पड़ेंगे…

जो कर्म हुआ है उसे मैं कर रहा हूँ- यह अंहकार है. यह भाव हमारे अन्दर ग्लानी जगाएगा, पीड़ा जगाएगा, भय जगाएगा, क्रोध जगाएगा.

शांत होना सीखो. कर्म फल को शांत रहते हुए भोगना सीख लो और ऐसे कर्म करो जिनके फल मीठे होँ.

सेवा में लग जाओ, तुम्हारे मन की सफाई होगी. साधना करोगे, तो संस्कार शुद्ध होंगे, वासनाऍ क्षय होंगीं. और सत्संग द्वारा कर्म को शांति से भोगने कि शक्ति आएगी.

Sunday, 14 October 2007

Gyaan kaa Dharm

ज्ञान का धर्म


पानी ऊपर से नीचे को बहता है. यही उसका धर्म है. वैसे ही ज्ञान ऊपर से नीचे को ही बहता है...

गुरू हमेशा शिष्य से ऊपर होते हैं- तभी ज्ञान दिया जा सकता है…

दो प्रकार के लोग ज्ञान देते हैं- एक जिन्हे अपनी बात का विश्वास है मगर ज्ञान नहीं है, और दूसरे जो सत्य को जानते हैं. दोनो में बहुत अंतर है.

तुम उसी चीज़ का विश्वास करते हो जो तुम जानते नहीं…

गुरू बनाना, किसी पंथ से जुड़ जाना बहुत आसान है, पर क्या आपने गुरू को प्राप्त किया?

उसके लिए तैयारी चाहिए.

क्या तुम अपने जीवन में बदलाव लाना चाहते हो? क्या तुम सच में जागना चाहते हो?

अभी तो तुम ज्ञान के बिना भी रह सकते हो. ज्ञान की भूख तुम में है ही नहीं.

रामकृष्ण परमहंस के पास एक व्यक्ति आया और बोला, ‘क्या आपने भगवान को देखा है? मुझे दिखा सकते हो?'

रामकृष्ण बोले, ‘हाँ. दिखा सकता हूँ. लेकिन तुम भगवान् देखने आये हो, नहा तो लो. चलो गंगा में डुबकी लगा लो.’

उस व्यक्ती ने डुबकी लगाई और रामकृष्ण ने उसका सर पानी में डूबा कर दबा दिया...

वह तड़पने लगा और ग़ुस्से में बाहर आया. ‘आप इतने बड़े संत हो! आप तो मुझे मार रहे थे!’

रामकृष्ण ने हंसकर उससे पूछा, ‘जब तू डूब रहा था, तब क्या चीज़ कि याद आ रही थी?’

वह बोला- ‘कि मुझे सांस कब मिलेगी!’

रामकृष्ण बोले, ‘जा! जब ऐसी तड़प तुझे ज्ञान की होगी, तभी तुझे भगवान् दिखेगा.’

हम लोग सब उपरी सतह पर जीना चाहते हैं- कैसे मिलेगा भगवान्? कृष्ण ने दुर्योधन की सभा में विश्वरूप दर्शन दिया, पर दुर्योधन को भगवान् नही दिखे. आपके सामने भगवान् आ जाये, आपको नहीं दिखेंगे...

पानी जिस बर्तन में डालो उस रुप का हो जाता है. ज्ञान सबसे निर्मल है. उसको तुम कहीं भी, किसी भी तरफ मोड़ सकते हो. जब तक तुम पवित्र नहीं हुए हो, तुम यह ज्ञान को अपने फ़ायदे के लिए मोड़ लेते हो. गीता पढ़कर चोर चोरी कर सकता है, आतंकवादी आतंक कर सकता है, तुम जो चाहो कर सकते हो…

और वही हो रहा है. फिल्मों मैं गीता के श्लोक लेकर क्या क्या कहानियां बना देते हैं. जब भी कोई मरता है, अखबार में उसकी फोटो के ऊपर नैनं छिन्दंती शास्त्राणि लिख देते हैं…

तुम्हारे शरीर का क्या धर्म है? बूढा होना और फिर ख़त्म हो जाना. हम शरीर को बूढा होने से रोकना चाहते हैं. शरीर के धर्म को तोड़ा मरोड़ा जा रहा है. धर्म संस्थापनार्थाय सम्भावामी युगे युगे. चाहे एक साल बाद, एक सौ साल बाद, या एक हज़ार साल बाद - इस शरीर को जाना ही है.

पानी का धर्म होता है नीचे जाना, आग का धर्म होता है ऊपर जाना. हमारा धर्म क्या है, अधर्म क्या है, इसे हम जानते ही नहीं.

‘शरीर अमर है’ इस भाव लेकर ध्यान में बैठना अज्ञान है.

क्या आप अपना धर्म पूरी तरह निभा रहे हो? अगर नहीं निभा रहे हो, तो वहाँ सम्भावामी युगे युगे होगा. बहुत ज़ोर का थप्पड़ पड़ेगा.

जैसे कुछ बच्चे, जिनको माँ बाप ने बहुत लाड़ प्यार देकर बड़ा किया हो बिगाड़ जाते हैं और जैसे वह बड़े होते हैं, उन्हें संसार में बहुत कष्ट होते हैं. लोग मज़ाक उड़ाते हैं. वही उनका सम्भावामी युगे युगे होता है…

ऐसा नही है कि अचानक एक दिन सफ़ेद कपडे पहनकर, सफ़ेद घोड़े पर सवार होकर, कल्कि अवतार आपके आस पास दौड़ेंगे. कल्कि मने क्या? जो अश्व पर सवार है. ‘श्व’ संस्कृत में ‘कल’ को बोलते हैं. अश्व मतलब जहाँ कल नहीं, जो अब में रहता है. जो वर्त्तमान में रहता है और ज्ञान कि तलवार से भूत और भविष्य को काटता हुआ जीवन व्यापन करता है. जो कोई रंग मे नहीं रंगा है. श्वेत है. अगर तुम वैसे हो जाओ तो तुम भी कल्कि हो…

कुरुक्षेत्र मतलब तुम्हारा मन. कौरव हैं इन्द्रीय भोग. पांडव मने पांच इन्द्रियां और कृष्ण मने आत्मा है.

मन बाहर की ओर मुड़ा है. उसको अन्दर मोड़ना है. इन्द्रियां जब इन्द्रीय भोग से हट जाती हैं तब संसार अपने आप विलुप्त हो जाता है.

रथ क्या है? रथ शरीर है, उसमे आत्मा सारथी है. अर्जुन सजगता है. कहाँ है मेरी सजगता? किन भोगों में? उसको अन्दर मोड़ना पड़ेगा.

कृष्ण आत्मा हैं. आप आँखें बंद करते हो- फिर भी आपका मन बाहरी संसार में भागता है, हमारी आत्मा का संसार इतना सुन्दर है, आनंद दायक है, वह आपको खींच लेगा- उसकी तरफ मन मोड़ना सीखना है. फिर तुम युद्ध जीत गए. यही गीता है…

गीता को एक किताब ही समझ कर लोग उसकी पूजा करते हैं. ऐसी अंधी भक्ती का कोई फायदा नहीं- यह ईश्वर की वाणी है, श्रद्धा से इसे पढ़ो, पूजा भाव में पढ़ो, मगर उसको एक पूजनीय वस्तु मानकर एक जगह पर संभाल रख दोगे तो कोई फायदा नहीं…

बाहरी पूजा एक खेल है. गुरु भी खेल है. ज्ञान भी खेल है. अज्ञान भी खेल है. यह जानते हुए खेल खेलते रहो…

भीतर से तुम स्थिर और शांत हो जाओ...

Saturday, 13 October 2007

Gyaan pipaasaa

ज्ञान पिपासा



गहरा ज्ञान प्राप्त करने के लिए तैयारी चाहिए. कच्चे घड़े में पानी डालोगे तो वह गल जाएगा, उसको आग में तपाना पड़ता है.

घड़ा मज़बूत होने पर ही वह पानी पकडता है. वैसे ही ज्ञान को अपने अन्दर समेटने के लिए साधना करनी पडेगी, तपस्या करनी पडेगी.

ज्ञान को धारण करने की क्षमता ध्यान, साधना, सेवा, चिन्तन, और संतों की संगत में रह कर बढती है…

तुम जिस वस्तु से बहुत प्यार करते हो, उसे बहुत संभाल कर रखते हो- है ना? जैसे भगवद गीता को लोग रेशम के कपडे में लपेट कर इज़्ज़त से रखते हैं. लेकिन उपन्यास या अखबार को ऐसे ही रख देते हैं. इन्हें तो लोग बाथरूम में भी ले जाते हैं!

साधना की और ज्ञान कि बहुत इज़्ज़त करनी चाहिए. अगर तुम ज्ञान की इज़्ज़त नहीं करोगे, ज्ञान तुम्हारी इज़्ज़त नहीं करेगा.

अपने भीतर ज्ञान पिपासा जगाओ. तब जाकर गहराई में उतर पाओगे.

फिर तो ऐसा होगा कि एक छोटी सी बात भी तुम्हारी अंतरात्मा को छू जाएगी.

कोई तुम्हारे सामने कुछ भी कह देगा और उसमे से ज्ञान प्रकट हो जाएगा…

साधारण बातों से तुम्हे गहरे ज्ञान का बोध हो जाएगा…

Asangoham

असंगोहम्



असंगोहम् का क्या अर्थ है?

यह संसार में तुम किसी न किसी चीज़ से जुडे हो.

जब तुम किसी चीज़ के संग हो जाते हो तब तुम कहते हो कि में बूढा हूँ, जवान हूँ, माँ हूँ, बाप हूँ, लम्बा हूँ, पतला हूँ, अमीर हूँ, गरीब हूँ…

यह हमारा स्वभाव है, किसी न किसी चीज़ के संग हो जाते हैं…

शंकराचार्य कहते हैं, असंगोहम्. मैं असंग हूँ. मेरी शुद्ध चेतना किसी चीज़ के संग नहीं है, किसी चीज़ से जुडी नहीं है, मैं असंग हूँ.

असंगोहम्. जैसे जैसे मैं गहराई में उतरता हूँ, मैं पाता हूँ कि मैं यह भी नहीं हूँ, मैं वह भी नहीं हूँ. मैं कुछ भी नहीं हूँ…

नित्य शुद्ध विमुक्तोहम्. मैं नित्य हूँ, मैं शुद्ध हूँ, मैं मुक्त हूँ...

असंगोहम् असंगोहम् असंगोहम् पुन: पुन:. बार बार मुझे यह बात को जानना है.

असंग भाव को याद करते करते, हर एक चीज़ से अलग हो जाना. और जब संसार में वापस आओ, तो फिर असंग हो जाना- बार बार, पुन: पुन:…

मुझे कुछ भी नहीं छू सकता, मैं किसी भाव में लिप्त नहीं हूँ, मैं किसी वस्तु के साथ उलझा नहीं. मैं किसी चीज़ के संग नहीं…

असंगोहम्, असंगोहम्, असंगोहम्, पुन: पुन:...

Tuesday, 9 October 2007

Swarg Narak Kya Hai?

स्वर्ग नरक क्या है?



Q: स्वर्ग नरक क्या चीज़ है?

A: जहाँ कर्म बनता है वहाँ नरक है, और जहाँ कर्म घटता है वहाँ स्वर्ग है.

तुम्हे कर्म बनाना है या घटाना है- यह तुम्हारे हाथ में है…

अपने कर्म को निष्काम बनाओ. जिस कर्म के पीछे कोई वेग नहीं है- there is no impulse, no reactivity.

तुम चाहो तो कर्म है, तुम नहीं चाहो तो नहीं है…

जब हम पूजा पाठ मे बैठते है, तब बिना समझे ही कर्म बनाते है.

अच्छा कर्म ही हो, मगर कर्म बनता है- और वह हमें संसार में फंसा कर रखता है...

We have defined it as a good karma and bad karma, karma is just karma. Karma is action.

आपने जाने अनजाने में कुछ किया और उसका कुछ कर्म बन गया…

Any action creates reaction, this is the law of this world, when you do not see reaction you call it a miracle…

There are subtle forces which can be accessed and controlled without use of the body- these are powerful siddhis…

पानी पर चलना, आग पर चलना, हवा में उड़ना, जो कुछ आपको प्रत्यक्ष समझ नही आता, अचम्भा सा दिखता है- ऐसी चीजों को आप आध्यात्म मान लेते हो- और जो सिद्ध पुरुष इन सिद्धियों को दिखलाते हैं, उनकी भक्ती करते हो…

पर यह भी कर्म से बंधी हुई चीज़ें हैं. इनका कर्म भी बनता है…

Even these will generate karmic retribution, since action is still happening in the material world- hence there is bound to be a reaction…

These are in fact creating greater karma. The laws of the spirit are different- here subtle is more powerful, than the gross…

सूक्ष्म में स्थूल से बहुत अधिक शक्ति है…

आपका शरीर वही करता है जो आपका मन कहता है. मन वही करता है जो बुद्धि कहती है, बुद्धि वही करती है जो चित्त कहता है…

The subtler is controlling the gross. This is the law; every level of our existence is connected with a subtler level- that is more powerful.

But the subtler levels also are bound by the law of karma, they are also part of the dimension where cause and the effect are happening...

Then what is the action which does not give any karma?

जहाँ कर्म बढ़ता है वह नरक है और जहाँ कर्म घटता है वह स्वर्ग है.

उस हिसाब से तो आप अच्छा करोगे तो भी आप नरक में जाओगे!

क्योंकि आप कर्म बना रहे हो. जिस क्षण आपने किसी चीज़ को अच्छा माना उसी क्षण आपने किसी चीज़ को बुरा मान लिया…

It happens automatically. Good can only exist because of bad.

The moment you have defined ‘good’, that very moment you have defined ‘bad’ too.

The moment you have said ‘this’, the same moment, ‘not this’ has appeared.

The moment you have labelled yourself as ‘I’, that very moment you have defined what is ‘not I’.

And the moment you have said these three things, you have created karma for yourself...

Every action occurs because there is a doer, something to be acted upon, and the process.

So the moment you act- whether physically or with some siddhis, have created duality...

कोई अच्छा या बुरा कर्म नही है, कर्म तो कर्म है. चोर का हो या संत का, Xray machine तो Xray निकालेगी ना?

आप कर्म करते हो- ना कोई अच्छा कर्म होता है ना बुरा कर्म होता है, कर्म तो सिर्फ कर्म होता है. आपने उसे अच्छा या बुरा स्वरूप दे दिया है.

नरक और स्वर्ग कर्म में नही हैं- तो फिर किस मे हैं?

आपके उस कर्म के पीछे क्या भाव है- उसमें हैं.

भाव से स्वर्ग और नरक बनता है.

इस भाव को कैसे शुद्ध किया जाये?

इसी ज्ञान में तुम्हारी मुक्ति है.

मोक्ष कर्म करने या छोड़ने में नही है. जो है वही ठीक है, जहाँ हो, जिस जीवन को जी रहे हो, वंही मोक्ष है…

कैसे?

मन को शुद्ध बनालो, केवल स्फूर्ति हो. अष्टवक्र कहते है 'निर्वासना स्फूर्ती मात्र:'- मन में केवल स्फूर्ति होनी चाहिए - impetus and movement of the mind and body, without desires...

तब यह मन आपको स्वर्ग में ले आएगा. ऐसा पवित्र मन बनाओ.

You are doing things because of reasons. Every action you perform is because of some reason. The moment you do any action without any impetus you will be free…

चित्त निर्मल हो जाने दो फिर उसमें से नेकी प्रकट होती है.

नेक भव में जीना सीखो…

Monday, 8 October 2007

Shiv

शिव




शिव आनंद और ज्ञान स्वरूप है।

सृष्टी केवल शक्ति नही है।

शक्ति ज्ञान का व्यक्त रुप है

जो अव्यक्त से

धर्म से प्रकट होती है।

यही शिव शक्ति का नृत्य है।

दोनो का लास्य

पुरुष और प्रकृति कि अभिव्यक्ति है…

Saturday, 4 August 2007

Suswaagatam


सुस्वागतम्


आत्मीय,

तुम्हारा अपने घर में स्वागत है...

मैं किसी विषय पर ज़्यादा तो नहीं जानता पर अपने अनुभव तुम्हारे साथ बाँट रहा हूँ...

मैंने तुम में एक सह पथिक पाया है जो आम से अलग सोच रखता है और अपने जीवन की राह खोज रहा है...

आओ, तुम और मैं साथ मिलकर इस धरती को स्वर्ग बनाएं...

साथ साथ हम अनजानी राहों पर चलें और नयी दिशाएं ढूंडें …

तुम्हारा हमक़दम,

दीपम्