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Wednesday, 20 May 2009

एक अनोखी भेंटवार्ता- ४

एक अनोखी भेंटवार्ता- ४

सफ़र के करीब दो घंटे बीत चुके थे और व्यक्ति को लगा कि यह वार्ता लम्बी चलेगी. वह मन ही मन मुस्कुरा रहा था. उसे यह समझ आ गया था कि लड़की की पूछताछ और जिज्ञासा उसके धर्म को हिंदू धर्म से ऊंचा साबित करने के लिए नहीं थी. लड़की में ख़ुद को जानने कि प्रबल इच्छा मालूम हो रही थी.
व्यक्ति जानता था कि धर्म और दुनियादारी की बातें बेकार के तर्कों को बढ़ावा देती हैं और किसी के कोई काम की नहीं होतीं. लड़की का प्रश्न ऐसा था जिसका जवाब इस वार्तालाप को एक नयी दिशा दे सकता था- जो बातचीत को धार्मिक बातों से परे, आध्यात्मिक बातों की ओर ले जा सकता था और लड़की को अपनेआप को जानने में मदद कर सकता था.
वह बोला, 'कर्म का सीधा सीधा मतलब होता है कोई भी कार्य (Action). जब हम कुछ भी काम करते हैं तो उसका असर (Effect) होता है. इसे हम कर्म और कर्मफल (Karma/Cause/Action and Fruit of Karma/Effect/Reaction) कह सकते हैं. यह कोई धार्मिक बात नहीं है बल्कि सरल सत्य है जो हमें रोज़ अपनी ज़िन्दगी में दिखता है.
मैं आपको एक उदाहरण देता हूँ. किसी बागीचे में हम बीज बोते हैं, उन्हें पानी से सींचते हैं, तो पौधे उगते हैं. मगर हर बीज से वही पौधा उगेगा जिसका बीज बोया गया हो. अगर आपने आम का पेड़ लगाया है तो उसमे संतरे तो नहीं उगेंगे, है कि नहीं?!'
'जी बिलकुल' लड़की बोली.
व्यक्ति आगे बोला, 'ठीक इसी प्रकार हमारे हर कर्मों (Actions) को बीज माना जा सकता है, और उनके असर (Effects) को कर्मफल (Fruits of Karma) माना जा सकता है.'
लड़की व्यक्ति की बात ध्यान से सुन रही थी.
व्यक्ति ने आगे कहा, 'मगर इसका एक और पहलू है. जैसे अलग अलग पौधों के बीज अगर एक समय पर भी बोए जाएँ, और पानी से सींचें जाएँ, फिर भी सब अपने अपने समय से ही बड़े होते हैं और अलग अलग समय पर फलते फूलते हैं; उसी प्रकार हमारे कर्म भी अलग अलग समय पर फलते हैं.'
'वो कैसे?'
'कर्मफल तीन प्रकार के होते हैं- पहले, ऐसे कर्म जिनका असर एकदम होता है- जैसे अगर आप अपना हाथ आग में डालोगे तो एकदम गर्मी लगेगी और जल जाएगा. दूसरे, वैसे कर्म जिनका असर कुछ समय के बाद होता है, जैसे अगर आपने थोड़ा बासी खाना खा लिया हो तो कुछ समय बाद पेट में दर्द होगा. और तीसरे, वह कर्म जिनका असर बहुत समय के बाद होता है- जैसे किसी इंसान ने किसी एच आई वी+ (HIV+) व्यक्ति के साथ यौन सम्बंध बनाए और बहुत साल बाद एड्स (AIDS) का शिकार हो गया.
हमारे जीवन में बहुत सी परिस्थितियाँ आती हैं जिन्हें हम समझ नहीं पाते, और भगवान को या परिस्थितियों को दोष देते हैं. लेकिन अगर हम Karma Theory कोसमझ लें तो अधिकतर प्रश्नों का बड़ी आसानी से निवारण हो जाता है.'
लड़की सोच में पड़ गयी थी. वह व्यक्ति की बातों से प्रभावित हो रही थी. वह इन बातों के द्वारा अपने जीवन की घटनाओं को समझने की कोशिश कर रही थी.
'मगर क्या आपकी Karma Theory मुझे यह बता सकती है कि कोई अमीर और कोई ग़रीब, कोई स्वस्थ और कोई बीमार क्यों पैदा होते हैं? किसी बच्चे को माँ-बाप का गहरा प्रेम और किसीको अपने माँ-बाप का प्यार क्यों नहीं मिलता?' बोलते बोलते, लड़की की आँखें भर आईं और उसकी आवाज़ कांपने लगी.
व्यक्ति समझ गया कि उसने लड़की की दुखती रग पर हाथ रख दिया था. कुछ देर तक उसने कुछ नहीं कहा. फिर वह धीरे से बोला, 'हिन्दू धर्म में यह मान्यता है कि हम केवल एक ही शरीर में जीवन को पूरी तरह नहीं समझ सकते, इसलिए, हमें कई बार जन्म लेना पड़ता है. आत्मा शरीर बदलती रहती है और अमर है. वही कर्म और कर्मफल भोगती है. कुछ कर्मों का भोग हमें अपने अगले जन्मों में करना पड़ेगा- और कुछ ऐसे कर्म जो हमने पिछले जन्मों में किये होंगे, उनका भोग हमें इस जन्म में करना पड़ रहा है.
अगर आपके जीवन में कोई ऐसी शारीरिक या मानसिक पीड़ा आई हो, जिसका कोई कारण आप नहीं समझ पा रहीं हैं, तो हिंदू धर्म के अनुसार, वह किसी पिछले जन्म के कर्म का फल है. लेकिन साथ ही साथ यह भी जानना उचित है कि पीड़ादायक कर्म फल किसी पाप (Sin) के कारण नहीं हैं और भगवान किसी को दंड (punishment) नहीं दे रहे.
हिंदू मान्यता के अनुसार, स्वर्ग-नर्क (Heaven and Hell) भोग केवल अपने कर्म के अच्छे और बुरे फल ही हैं, और कुछ भी नहीं.'
लड़की ने कुछ सोच कर कहा, 'इसका मतलब आप हिंदू तो भगवन में कोई विश्वास ही नहीं करते! जब सब कुछ अपने ही हाथ में है- तो भगवान कि ज़रुरत ही नहीं जान पड़ती है!'
व्यक्ति बोला, 'ऐसा नहीं है, भगवान तो श्रद्धा की बात है. इसीलिए हिंदू धर्म में इश्वर को सगुण साकार 'एवं' निर्गुण निराकार दोनों ही कहा गया है.'
'तो आपका कहना है की मेरे जीवन में जो कुछ हुआ है और हो रहा है, उसका कारण मेरे ही कर्म हैं? और ईश्वर का उसमे कोई हाथ नहीं? इसका मतलब तो यह हुआ की ईश्वर से अपने पापों के लिए माफी मांगने से (Asking for forgiveness for one's sins) आपके पाप कभी नहीं धुलेंगे!
हमारा धर्म तो कहता है की जीज़स हमारे पापों के लिए सूली चढ़े थे. और अगर हम कोई भी गलत काम करते हैं, और हमें उसके लिए पश्चात्ताप होता है, तो हम उनसे माफ़ी मांग कर मुक्त हो सकते हैं. इसका मतलब तो यही हुआ कि आपके हिंदू धर्म में मुक्त होने का कोई रास्ता ही नहीं है!'
व्यक्ति मुस्कुराकर सर हिलाने लगा और कुछ देर के लिए चुप हो गया. यही बात उसने कितने ही पाश्चात्य धर्म के अनुयायियों के मुख से सुनी थी. इसी बात को लेकर वे सब हिंदू धर्म का विरोध करते हैं.
'हिंदू धर्म में इश्वर मनुष्य कि पूरी पूरी देखभाल करते हैं। मनुष्य अगर अपने पापों का प्रायश्चित्त करे तो भगवान उस पर मेहर (Grace) बरसा देते हैं.
मगर, जैसे अगर कोई बच्चे ने अगर गलती कि हो और माफ़ी मांग ले, तो उसकी गलती कम नहीं हो जाती. उसे गलती का एहसास होने के लिए दंड भोगना ज़रूरी होता है. उसी प्रकार, हमें अपने कर्मों के फल भोगने ही पड़ते हैं. बारिश में कोई भीग रहा हो, और भगवान से बचाव कि प्रार्थना करे, तो भगवान उसे मेहर और ज्ञान की छतरी दे देंगे, मगर बरसात को रोकेंगे नहीं!
वैसे ही कर्म फल की 'बरसात' से बचने के लिए, ज्ञान और साधना कि 'छतरी' का सहारा लेना चाहिए. माफ़ी मांगने (Praying for Forgiveness) से अंहकार (Ego) और ग्लानि (Guilt) कम होती है.
लड़की बोली, 'मगर आप एक ही ईश्वर पर क्यों विश्वास नहीं करते?
(क्रमशः)

Tuesday, 19 May 2009

एक अनोखी भेंटवार्ता- ३


व्यक्ति आगे बोला, 'भारत में हिंदू धर्म पर हज़ारों साल से विदेशी साम्राज्यों के आक्रमण होते रहे हैं. कितने ही धर्म और धार्मिक प्रथाओं को हिंदुओं ने अपने सनातन धर्म के विशाल आँचल में समेट लिया. हिंदू धर्म तो जीवन जीने की शैली है, और आपको इसमें हर एक धर्म से मिलतीजुलती धार्मिक शिक्षाएं मिलेंगी.'
लड़की बोली, 'मुझे यह सब समझ तो नहीं आ रहा है, मगर यह हिन्दू धर्म बड़ा दिलचस्प लगता है।'
फिर कुछ सोच कर वह अचानक बोली, 'क्या आप धार्मिक हैं?'
'हम्म... यह कहना थोड़ा मुश्किल है। अगर आपके Christian धर्म के अनुरूप कहूं, तो हो सकता है मैं धार्मिक नहीं हूँ क्योंकि मैं कभी कभी मंदिर चला जाता हूँ, और इच्छानुसार पूजा पाठ करता हूँ- अथवा नहीं।'
लड़की बोली, 'हमारे रोमन कैथलिक (Roman Catholic) धर्म में हर रविवार चर्च जाकर, पादरी से बाईबल के कुछ उपदेश सुनना और कम्युनिअन (communion) ग्रहण करना अच्छा मानते हैं।'
व्यक्ति बोला, 'हम हिंदू चाहें तो मंदिर जाकर प्रार्थना कर सकते हैं। लेकिन अगर कोई हिंदू ज़िन्दगी में कभी भी मंदिर नहीं जाए, तो भी वे धार्मिक हो सकता हैं।'
लड़की को यह बात बड़ी अजीब लगी। उसके धर्म में तो हर चीज़ अक्षरशः विधित थी। उसको रह रह कर नन और पादरी की बातें याद आ रही थीं।
'अच्छा यह बताईये कि क्या आपके धर्म में हिंदू बनने की
कोई प्रथा (Initiation Ritual to be formally ordained as a Hindu) है? जैसे हमारे क्रिश्चियन कैथलिक धर्म में बैप्टिज़म (Baptism) द्वारा हम अपने धर्म में शामिल किए जाते हैं.
व्यक्ति बोला, 'हिंदू धर्म में ऐसी कोई Initiation प्रथा नहीं है। ऐसी कोई भी रीती नहीं है जिसको पूर्ण करने पर कोई ऐसी घोषणा करे कि 'चलो! आज से तुम हिंदू धर्म के अनुयायी हुए!' हिंदू धर्म तो जीवन जीने की एक शैली है। कोई भी, किसी भी समय हिंदू धर्म अपना सकता है। इसके लिए उसे किसी कि आज्ञा या फिर कोई भी प्रथाओं से गुज़रने की कोई ज़रूरत नही!'
वह इसलिए क्योंकि हर व्यक्ति जन्म से हिंदू होता है। हाँ, व्यक्ति के अच्छे जीवन निर्वाह के लिए ऋषियों ने व्यक्ति के जीवन में कुछ संस्कार निर्धारित किए थे। जैसे कि मुंडन, कान छेदना, जनेऊ संस्कार, विवाह के रीति-रिवाज़ आदि। मगर इन्हे आजकल के हिंदू बहुत कम मानते हैं। लेकिन, उनको कोई माने या न माने, इससे उनके हिंदू होने पर कोई असर नहीं पड़ता है।
लड़की को यह बात भी बड़ी अजीब लग रही थी। भला कोई व्यक्ति बिना रीति रिवाज़ों के किसी धर्म में कैसे शामिल किया जा सकता है। जितना वह जानती थी, ऐसे व्यक्ति तो नास्तिक (Heathen) कहलाते हैं!
'क्या आपने कभी कोई और धर्म अपनाने के बारे में सोचा है?'
'क्यों भला?!' व्यक्ति हंसकर बोला। 'हिंदूओं को अपने धर्म के हर पहलू का विरोध करते हुए, उसे जैसा चाहें वैसे बदल कर, अपने अनुरूप धर्म को मानने की पूरी पूरी छूट है। कोई भी सच्चा हिंदू धर्म परिवर्तन में विश्वास नहीं करता। हर हिंदू को धर्म और प्रथाओं को मानने अथवा प्रश्न करने कि पूरी छूट है। मैं इच्छा से हिंदू हूँ, कोई ज़ोर-ज़बरदस्ती से नहीं।'
'हर हिंदू अपने विश्वास को पूजा, सेवा या साधना, या फिर तीनों करके गहरा कर सकता हैं। सबसे बड़ी बात यहाँ रूचि की है। जिस व्यक्ति को जो भी पसंद हो वह उसी प्रकार से अपना धर्म जी सकता है। जब मैं छोटा था तब मुझे पूजा-पाठ में रूचि थी, मगर अब मैं अपने भगवान के प्रेम में इतना डूब गया हूँ कि, कर्म-काण्ड (Ritualistic worship) से बहुत दूर हो गया हूँ। अब मैं...'
'एक मिनट!' लड़की ने उसकी बात काटते हुए कहा, 'क्या आप अपने भगवान से डरते नहीं हो?!'
'भगवान तो मित्र होते हैं!' व्यक्ति बोला। 'भगवान तो हमारे सबसे आत्मीय प्रेमी और घनिष्ठ दोस्त होते हैं। माता, पिता या फिर किसी भी सांसारिक दोस्त से हज़ारों गुना अधिक प्रिय!'
'नहीं। मैं अपने भगवान से बिलकुल नहीं डरता। हिंदू धर्म में ऐसी कहीं कोई बात नहीं है।'
'हाँ। बुरे कर्म करने पर बुरे फल मिलते हैं और अच्छे कर्मों का नतीजा अच्छा ही होता है। उसमे भगवान का कोई भी हाथ नहीं है। जैसा करोगे वैसा भोगोगे- यह हिंदू धर्म की मान्यता है। इसे पाश्चात्य जगत के लोग 'Karma Theory' कहते हैं'।
लड़की अपनी सीट पर थोड़ा ठिठककर बैठ गयी। उसकी उत्सुकता साफ़ दिखाई दे रही थी।
'यह Karma शब्द तो मैंने सुना है! मगर इसके बारे में मुझे कुछ पता नहीं है। क्या है यह 'Karma Theory'?'
(क्रमशः)

Monday, 15 October 2007

Karm ke sookshm phal

कर्म के सूक्ष्म फल



कर्म का एक बाहरी असर होता है, एक भीतरी असर होता है.

कर्म का जो असर संसार में होता है, हम उसे ही जानते हैं.

लेकिन बाहरी असर बहुत कम है- समझो १%. कर्म का ९९% असर भीतर, हमारी चेतना पर होता है.

थोड़े दिनों तक कोई कर्म बार बार करने से वह हमारा स्वभाव हो जाता है. हमारी चेतना पर इसका असर हो जाता है.

जैसे तुम्हे सफाई रखना पसंद है- यह संस्कार तुम्हारे अन्दर सालों से बैठ गया है, तो तुम जहाँ जाओगे वहीं सफाई रखोगे.

जब तुम कोई कर्म करते हो, उसका असर मन पर, विचारों पर पड़ता है- इस से संस्कार बनते हैं.

हम लोग बाहरी असर की ही चिंता करते हैं, “यह क्या हुआ? कैसे हुआ?”

तुम यह नहीं जानते, कि तुम्हारी चेतना पर उसका कितना गहरा असर होता है. तुम्हारे सारे भाव वहाँ से उठते हैं, तुम्हारे सारे विचार उसमे से प्रकट होते हैं, तुम्हारे सारे कर्म वहाँ बनते हैं.

जो भी कर्म करो, उसका संसार में प्रकट कर्म फल तो भोगना ही पड़ेगा, लेकिन चेतना पर जो उसका असर होगा, उस पर तुम्हे बहुत ध्यान देना पडेगा.

सेवा में लग जाओ. साधना करो. सत्संग में बैठो.

सेवा से तुम्हारे विचारों और भावों कि शुद्धि होगी. साधना करोगे, तो संस्कार शुद्ध होंगे, वासनायें क्षय होंगी, चेतना निर्मल होगी. सत्संग में ज्ञान जागेगा कि पीड़ादायक कर्म नहीं बनाते हुए कैसे जीवन व्यापन करें. प्रारब्ध कर्म फल भोगने की शक्ति आएगी.

Sunday, 14 October 2007

Gyaan kaa Dharm

ज्ञान का धर्म


पानी ऊपर से नीचे को बहता है. यही उसका धर्म है. वैसे ही ज्ञान ऊपर से नीचे को ही बहता है...

गुरू हमेशा शिष्य से ऊपर होते हैं- तभी ज्ञान दिया जा सकता है…

दो प्रकार के लोग ज्ञान देते हैं- एक जिन्हे अपनी बात का विश्वास है मगर ज्ञान नहीं है, और दूसरे जो सत्य को जानते हैं. दोनो में बहुत अंतर है.

तुम उसी चीज़ का विश्वास करते हो जो तुम जानते नहीं…

गुरू बनाना, किसी पंथ से जुड़ जाना बहुत आसान है, पर क्या आपने गुरू को प्राप्त किया?

उसके लिए तैयारी चाहिए.

क्या तुम अपने जीवन में बदलाव लाना चाहते हो? क्या तुम सच में जागना चाहते हो?

अभी तो तुम ज्ञान के बिना भी रह सकते हो. ज्ञान की भूख तुम में है ही नहीं.

रामकृष्ण परमहंस के पास एक व्यक्ति आया और बोला, ‘क्या आपने भगवान को देखा है? मुझे दिखा सकते हो?'

रामकृष्ण बोले, ‘हाँ. दिखा सकता हूँ. लेकिन तुम भगवान् देखने आये हो, नहा तो लो. चलो गंगा में डुबकी लगा लो.’

उस व्यक्ती ने डुबकी लगाई और रामकृष्ण ने उसका सर पानी में डूबा कर दबा दिया...

वह तड़पने लगा और ग़ुस्से में बाहर आया. ‘आप इतने बड़े संत हो! आप तो मुझे मार रहे थे!’

रामकृष्ण ने हंसकर उससे पूछा, ‘जब तू डूब रहा था, तब क्या चीज़ कि याद आ रही थी?’

वह बोला- ‘कि मुझे सांस कब मिलेगी!’

रामकृष्ण बोले, ‘जा! जब ऐसी तड़प तुझे ज्ञान की होगी, तभी तुझे भगवान् दिखेगा.’

हम लोग सब उपरी सतह पर जीना चाहते हैं- कैसे मिलेगा भगवान्? कृष्ण ने दुर्योधन की सभा में विश्वरूप दर्शन दिया, पर दुर्योधन को भगवान् नही दिखे. आपके सामने भगवान् आ जाये, आपको नहीं दिखेंगे...

पानी जिस बर्तन में डालो उस रुप का हो जाता है. ज्ञान सबसे निर्मल है. उसको तुम कहीं भी, किसी भी तरफ मोड़ सकते हो. जब तक तुम पवित्र नहीं हुए हो, तुम यह ज्ञान को अपने फ़ायदे के लिए मोड़ लेते हो. गीता पढ़कर चोर चोरी कर सकता है, आतंकवादी आतंक कर सकता है, तुम जो चाहो कर सकते हो…

और वही हो रहा है. फिल्मों मैं गीता के श्लोक लेकर क्या क्या कहानियां बना देते हैं. जब भी कोई मरता है, अखबार में उसकी फोटो के ऊपर नैनं छिन्दंती शास्त्राणि लिख देते हैं…

तुम्हारे शरीर का क्या धर्म है? बूढा होना और फिर ख़त्म हो जाना. हम शरीर को बूढा होने से रोकना चाहते हैं. शरीर के धर्म को तोड़ा मरोड़ा जा रहा है. धर्म संस्थापनार्थाय सम्भावामी युगे युगे. चाहे एक साल बाद, एक सौ साल बाद, या एक हज़ार साल बाद - इस शरीर को जाना ही है.

पानी का धर्म होता है नीचे जाना, आग का धर्म होता है ऊपर जाना. हमारा धर्म क्या है, अधर्म क्या है, इसे हम जानते ही नहीं.

‘शरीर अमर है’ इस भाव लेकर ध्यान में बैठना अज्ञान है.

क्या आप अपना धर्म पूरी तरह निभा रहे हो? अगर नहीं निभा रहे हो, तो वहाँ सम्भावामी युगे युगे होगा. बहुत ज़ोर का थप्पड़ पड़ेगा.

जैसे कुछ बच्चे, जिनको माँ बाप ने बहुत लाड़ प्यार देकर बड़ा किया हो बिगाड़ जाते हैं और जैसे वह बड़े होते हैं, उन्हें संसार में बहुत कष्ट होते हैं. लोग मज़ाक उड़ाते हैं. वही उनका सम्भावामी युगे युगे होता है…

ऐसा नही है कि अचानक एक दिन सफ़ेद कपडे पहनकर, सफ़ेद घोड़े पर सवार होकर, कल्कि अवतार आपके आस पास दौड़ेंगे. कल्कि मने क्या? जो अश्व पर सवार है. ‘श्व’ संस्कृत में ‘कल’ को बोलते हैं. अश्व मतलब जहाँ कल नहीं, जो अब में रहता है. जो वर्त्तमान में रहता है और ज्ञान कि तलवार से भूत और भविष्य को काटता हुआ जीवन व्यापन करता है. जो कोई रंग मे नहीं रंगा है. श्वेत है. अगर तुम वैसे हो जाओ तो तुम भी कल्कि हो…

कुरुक्षेत्र मतलब तुम्हारा मन. कौरव हैं इन्द्रीय भोग. पांडव मने पांच इन्द्रियां और कृष्ण मने आत्मा है.

मन बाहर की ओर मुड़ा है. उसको अन्दर मोड़ना है. इन्द्रियां जब इन्द्रीय भोग से हट जाती हैं तब संसार अपने आप विलुप्त हो जाता है.

रथ क्या है? रथ शरीर है, उसमे आत्मा सारथी है. अर्जुन सजगता है. कहाँ है मेरी सजगता? किन भोगों में? उसको अन्दर मोड़ना पड़ेगा.

कृष्ण आत्मा हैं. आप आँखें बंद करते हो- फिर भी आपका मन बाहरी संसार में भागता है, हमारी आत्मा का संसार इतना सुन्दर है, आनंद दायक है, वह आपको खींच लेगा- उसकी तरफ मन मोड़ना सीखना है. फिर तुम युद्ध जीत गए. यही गीता है…

गीता को एक किताब ही समझ कर लोग उसकी पूजा करते हैं. ऐसी अंधी भक्ती का कोई फायदा नहीं- यह ईश्वर की वाणी है, श्रद्धा से इसे पढ़ो, पूजा भाव में पढ़ो, मगर उसको एक पूजनीय वस्तु मानकर एक जगह पर संभाल रख दोगे तो कोई फायदा नहीं…

बाहरी पूजा एक खेल है. गुरु भी खेल है. ज्ञान भी खेल है. अज्ञान भी खेल है. यह जानते हुए खेल खेलते रहो…

भीतर से तुम स्थिर और शांत हो जाओ...

Saturday, 13 October 2007

Gyaan pipaasaa

ज्ञान पिपासा



गहरा ज्ञान प्राप्त करने के लिए तैयारी चाहिए. कच्चे घड़े में पानी डालोगे तो वह गल जाएगा, उसको आग में तपाना पड़ता है.

घड़ा मज़बूत होने पर ही वह पानी पकडता है. वैसे ही ज्ञान को अपने अन्दर समेटने के लिए साधना करनी पडेगी, तपस्या करनी पडेगी.

ज्ञान को धारण करने की क्षमता ध्यान, साधना, सेवा, चिन्तन, और संतों की संगत में रह कर बढती है…

तुम जिस वस्तु से बहुत प्यार करते हो, उसे बहुत संभाल कर रखते हो- है ना? जैसे भगवद गीता को लोग रेशम के कपडे में लपेट कर इज़्ज़त से रखते हैं. लेकिन उपन्यास या अखबार को ऐसे ही रख देते हैं. इन्हें तो लोग बाथरूम में भी ले जाते हैं!

साधना की और ज्ञान कि बहुत इज़्ज़त करनी चाहिए. अगर तुम ज्ञान की इज़्ज़त नहीं करोगे, ज्ञान तुम्हारी इज़्ज़त नहीं करेगा.

अपने भीतर ज्ञान पिपासा जगाओ. तब जाकर गहराई में उतर पाओगे.

फिर तो ऐसा होगा कि एक छोटी सी बात भी तुम्हारी अंतरात्मा को छू जाएगी.

कोई तुम्हारे सामने कुछ भी कह देगा और उसमे से ज्ञान प्रकट हो जाएगा…

साधारण बातों से तुम्हे गहरे ज्ञान का बोध हो जाएगा…

Monday, 8 October 2007

Shiv

शिव




शिव आनंद और ज्ञान स्वरूप है।

सृष्टी केवल शक्ति नही है।

शक्ति ज्ञान का व्यक्त रुप है

जो अव्यक्त से

धर्म से प्रकट होती है।

यही शिव शक्ति का नृत्य है।

दोनो का लास्य

पुरुष और प्रकृति कि अभिव्यक्ति है…

Satya Kya Hai

सत्य क्या है




बाल्टी के साथ रस्सी बंधी है. कूएँ में डाली है. रस्सी काटोगे नहीं तो बाल्टी डूबेगी नहीं.

तुम्हारा ध्यान इसलिये अधूरा है क्योंकि तुम संसार को पीछे छोड़ते नहीं...

ध्यान के बाद कि planning करके ही बैठते हो. सारे commitments zero करके बैठते ही नही.

चेतना में कोई ना कोई बीज पड़े रहते हैं.

कहाँ कहाँ रस्सी बाँध रखी है.

ज्ञान से वासनाओं के बीज जल जायेंगे.

किसी चीज़ के बारे में जानना और किसी चीज़ को जानना अलग है.

बिना शब्दों के ‘मैं कौन हूँ’ इसको जानो और फिर बिना शब्दों के संसार देखो.

मैं कहाँ कहाँ फंसा है.

ध्यान में सजगता नहीं है.

अभी विवेक ही नहीं जागा. पहले रस्सी को काटना है कि ‘यह सब सच है’.

शब्द और मतलब को छोडो. जो इसको जान रहा है, उसकी ओर ध्यान दो…

Saturday, 4 August 2007

Suswaagatam


सुस्वागतम्


आत्मीय,

तुम्हारा अपने घर में स्वागत है...

मैं किसी विषय पर ज़्यादा तो नहीं जानता पर अपने अनुभव तुम्हारे साथ बाँट रहा हूँ...

मैंने तुम में एक सह पथिक पाया है जो आम से अलग सोच रखता है और अपने जीवन की राह खोज रहा है...

आओ, तुम और मैं साथ मिलकर इस धरती को स्वर्ग बनाएं...

साथ साथ हम अनजानी राहों पर चलें और नयी दिशाएं ढूंडें …

तुम्हारा हमक़दम,

दीपम्