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Sunday, 28 October 2007

Grah Shanti Aur Gyan

ग्रह शांति और ज्ञान



--क्या शनि और मंगल ग्रहों का असर होता है? क्या इन के प्रभाव से बचने के लिए पूजा करवानी चाहिए?


किसी को असर करेगा, किसी को नहीं करेगा. ग्रह अपना प्रभाव करते हैं. लेकिन केवल उनपर, जिन पर असर पड़ सकता है.

जैसे एक छोटा बच्चा है, उसे कंकड़ मारोगे तो चोट लगेगी, पर किसी बड़े व्यक्ति को वही कंकड़ मारेंगे तो उसे चोट नहीं लगेगी. वैसे ही, जो व्यक्ति अज्ञान में है उसे असर होगा. लेकिन जो ज्ञान में जाग गया उसे कुछ नहीं होगा.

जो मंगल और शनि से शक्ति में ज़्यादा है, वह उसको कुछ नहीं कर पाएंगे. जो उनसे कमज़ोर है, उस पर ही वह असर करेंगे. असर तो उन पर भी उतना ही होगा जो ज्ञान में हैं, मगर उन पर उसका कोई दुष्प्रभाव नहीं होगा.

ग्रहों की शक्तियाँ ज़रूर हैं पर अगर तुम ज्ञान में आ जाते हो, तो उन के प्रभाव से अधिक शक्तिशाली हो जाते हो.

अगर तुम्हे गाड़ी चलानी अच्छे से आती है, तो तुम खड्डों वाले रास्ते पर भी चला लेते हो और अच्छे रास्ते पर भी चला लेते हो. जिसको मंगल लगा होता है उसके रास्ते में थोडे खड्डे होते हैं, बस. और अगर वह ज्ञान में है, तो वह देख देख के गाड़ी चला लेता है, और आराम से जीवन का रास्ता पार कर लेता है..

पर अगर अंधा गाड़ी चला रहा है तो वह खड्डे में गिरेगा. यही होता है जब लोग अंधविश्वास में ग्रह शांति पूजा पाठ करवाते हैं.

वह पोंगा पंडितों को बुला लेते हैं, ज्ञान को नहीं!

तुम्हें तो केवल आँखें खोलनी हैं. आँखें खोलोगे तो किसी चीज़ का भय ही नहीं होगा.

मंगल भी तुम्हारे भीतर है, शनि भी तुम्हारे भीतर है, गुरु भी तुम्हारे भीतर है, चन्द्रमा और सूर्य भी तुम्हारे भीतर हैं…

इन सब चीजों से क्यों डरते हो? यह सब कुछ नहीं हैं. सब तुम्हारे साथ खेलेंगे, सब तुम्हारे दोस्त बन जाएंगे.

जब तुम जागोगे तो पाओगे की सारी सृष्टि तुम्हारा खिलोना है, और ईश्वर तुम्हारे मित्र…

Thursday, 25 October 2007

Teen Maalii

तीन माली


एक बहुत अच्छा राजा था. उस राजा के पास एक बहुत सुन्दर और बहुत बड़ा बागीचा था. उस बागीचे का एक कोना जंगल के साथ लगा हुआ था.

राजा और रानी बागीचे मैं घूमा करते थे. तीन माली उनके बागीचे की देखभाल करते थे.

एक दिन, राजा रानी बागीचे में टहल रहे थे. राजा रानी बात करते हुए मस्ती में घूम रहे थे. अचानक राजा का महामंत्री दौड़ा, दौड़ा आया, उसे राजा को कोई बहुत ज़रूरी बात बतानी थी. उनकी बात कुछ लंबी होने लगी, तो राजा ने रानी से कहा ‘तुम अगर चाहो तो थोड़ा आगे चली जाओ, मैं इनसे बात कर लेता हूँ, फिर मैं तुम्हारे साथ हो लूंगा.’

रानी बोली ‘ठीक है आप जैसा कहें.’ रानी टहलती हुई दूर निकल गयी और बागीचे के आख़िर तक पहुंच गयी.

तीनों माली जंगल के पास ही काम कर रहे थे. अचानक, जब रानी वहाँ पहुँची, एक बहुत बड़ा शेर दहाड़ता हुआ, रानी की ओर झपटा. तब तीनों माली दौड़कर आये और शोर मचाने लगे. उन्होंने डंडे लेकर उस शेर को डराया तो वह भाग गया.

रानी मालियों की वजह से बच गयी. वह काफ़ी डरी हुई थी. वह तीनों मालियों को साथ लेकर वापस पहुँची और राजा को सब कुछ बताया.

राजा मालियों से बोले, ‘बहुत अच्छा काम किया आप तीनों ने. मैं आपका आभारी हूँ. मंत्रीजी, इन्हें मुंहमांगा इनाम दीजिये’

मंत्री ने उनसे पूछा, तो एक माली मुस्कुराता हुआ बोला, ‘रहने दीजिये, हमने तो अपना कर्तव्य निभाया.’

राजा बोले ‘फिर भी, कुछ तो बोलो क्या चाहिए? हम तुम्हारी हर इच्छा पूरी करेंगे.’

माली बोला, ‘राजाजी, अगर आप देना ही चाहते हो, तो मुझे एक ही चीज़ चाहिए- मैं एक दिन के लिए इस देश का राजा बनना चाहता हूँ.’

हँसते हुए राजा बोले, ‘बस इतनी सी बात? ठीक है, एक दिन के लिए तुम इस देश का कार्यभार संभाल लेना.’

दूसरे माली ने इनकी बातें सुन ली थीं. जब उस से पूछा गया, तो उसने बोला, ‘राजाजी, मुझ को भी एक दिन का राजा बनना है.’ राजा बोले ‘ठीक है.’

तीसरा भी पीछे क्यों रहता. उसने भी वही बोला, ‘मैं भी एक दिन के लिए राजा बनना चाहता हूँ.’

राजा हंसकर बोले ‘भाई ठीक है, तीनों को एक, एक दिन के लिए राजा बना देते हैं, और हम घूमने चले जाते हैं.’

सबको बता दिया गया कि राजा ने आज्ञा दी है कि यह तीनों माली एक एक दिन के लिए राजा बनेंगे और सबको इनका कहा मानना पड़ेगा। राजा ने मंत्री को आज्ञा दी की जब हर माली का राजकार्य समाप्त हो तो उनको कोई धन देकर घर भेजा जाये।

पहले दिन पहला माली आया, मंत्री उसको बोले, ‘आप महाराज हैं, आज आपका दिन है, आप जो चाहे कर सकते हैं.’ उस माली ने कहा, ‘मुझे राजगुरुजी के पास ले चलिए.’

वह राजगुरु को प्रणाम करके, बोला ‘गुरुजी, ये दिन मुझे मिला है, आप बताइये मुझे क्या करना चाहिए?’ राजगुरु थोड़ी देर सोचकर बोले, ‘गरीबों को कुछ दान दे दो, अच्छा रहेगा.’

तो पहला माली बोला, 'महामंत्रीजी सब गरीबों को जैसा आप ठीक समझते हैं, धन सम्पत्ति का दान दीजिये. मैं यहीं रहूँगा.'

फिर वह गुरुजी को बोला ‘गुरुजी, मैं आपके पास दिन काटने के लिए जीवन भर तरसता रहा. मुझे यह मौका मिला, तो आपसे मिलने का रास्ता मिल गया. आज सारे दिन मैं आप के समीप बैठकर ज्ञान पाना चाहता हूँ.’

गुरु उसको ज्ञान और धर्म की बातें बताने लगे. शाम को महामंत्री वापस आए और इस माली को कहा, ‘आज का राज काज अच्छे से गुज़र गया है. अब आपका कार्य समाप्त हुआ.'

गुरु ने कहा, ‘लेकिन मेरा कार्य अभी बाक़ी है. बेटा तुम में लगन है. तुम आज से मेरे शिष्य हुए. जो तुमने राजा बनकर पाया है, वह तुम अब साधारण माली होकर भी पाओगे. तुम जब चाहो यहाँ बिना रोक टोक आ जा सकते हो.’

मंत्री ने राजा की आज्ञानुसार पहले माली को कुछ धन देना चाहा, तो उसने इनकार किया, ‘मुझे तो मेरा धन मिल गया है. इस धन को भी गरीबों में बाँट दीजिये.’ और पहला माली ख़ुशी ख़ुशी अपने घर चला गया.

अगला दिन हुआ, अगला माली आया, मंत्री बोले, ‘आज आप राजा हैं, तो आप बताइये आप क्या करना चाहेंगे?’ उसने पूछा, ‘कल क्या हुआ?’ मंत्री बोले, ‘कल हम लोगों ने गरीबों में धन बांटा.’

दूसरा माली बोला, ‘अच्छा है. वही चलने दीजिये, हम खुद जाएंगे और सब को धन बाँटेंगे.’ वह एक बार गुरुजी को प्रणाम करके आ गया और वह खुद उस दान कार्य में जुड़ गया. वह मंत्री से हर कार्य से पहले उसके बारे में जानकारी लेकर अपनी सलाह देता - ‘नहीं उनको ये वस्तु दो, ऐसे दो, ये क्यों दे रहे हो?’

वह मंत्री से सब राजपाठ कि बातें करने लगा, और उसने कुछ अच्छे सुझाव भी दिए. उसने बढ़िया भोजन खाया, अपने सारे दोस्तों के साथ मौज मस्ती की. दरबार मैं बैठकर फरियादें सुनीं, सबके साथ खूब बातचीत की, और शाम को जब उसका दिन ख़त्म हुआ, तो मंत्री ने उसे कुछ धन दिया, और राजनीति सीखने का आमंत्रण भी दिया. और दूसरा माली भी ख़ुशी ख़ुशी अपने घर चला गया।

तीसरा दिन हुआ. तीसरा माली आया. फिर मंत्री बोले, ‘आज आप राजा हैं, तो आप बताइये आप क्या चाहते हैं?’ तीसरा माली थोड़ा चतुर था. बोला, ‘हम आज राजा हैं, हमारी रानियाँ कहाँ हैं?’

मंत्री बोले, ‘पटरानी तो राजाजी के साथ गयी हैं, लेकिन राजा की तीन और रानियाँ हैं.’ तीसरा माली बोला, ‘अच्छा है. हम आज रानियों के साथ रहेंगे.’

अब मंत्री तो मंत्री होते हैं. उसने भी सोचा कि कैसे यह दिन बिना रोक टोक निकल जाये.

मंत्री ने कहा, ‘जैसी आप कि आज्ञा राजाजी. आप राजा हैं, आप जो चाहे कर सकते हैं.

लेकिन आप माली का काम करते हैं इसलिए आपका शरीर थोड़ा कड़ा है. रानियाँ बहुत कोमल हैं, वह तो महलों में बड़ी हुई हैं, वह आपके साथ अभी इस स्थिती मैं नहीं रह पायेंगी.

ऐसा करते हैं, पहले मैं आपको चंदन का लेप लगवाकर गुलाबजल से नहलवा देता हूँ, मालिश करवा देता हूँ, आपकी दाढ़ी बनवा देता हूँ, बाल कटवा देता हूँ, manicure, pedicure करवा देता हूँ, foot massage, head massage, सब कुछ करवा देता हूँ.

और तब तक मैं रानियों को भी आपके लिए तैयार करवा देता हूँ. कमरे में फूल सजवा देता हूँ. उसके बाद आप बढ़िया पोशाक पहनकर रानियों के पास चलियेगा.’

तीसरा माली बोला, ‘अरे वाह! बहुत बढ़िया plan बनाया है आपने मंत्रीजी.’

फिर क्या था, चंपी वाला, मालिश वाला, accupressure वाला, नाई- सब झट बुला लिए गए. मंत्री ने सबको आज्ञा दी, ‘इन महाशय की ऎसी बढ़िया तरह से मालिश करना कि इनको गहरी नींद आ जाये. और सब कुछ आपको बहुत धीरे धीरे करना है. एक के बाद एक जाना. यह नहीं कि सारे एक साथ उनके पास चले जाओ.’

माली तो रोज़ भारी काम करते हैं- कभी इस माली को ऐसी बढ़िया मालिश जिंदगी में नहीं मिली थी. साथ ही साथ उसे भरपेट मिठाइयां, पकवान और नींद की गोली मिलाकर शरबत भी दे दिया गया. और वह ऐसा सोया कि फिर देर रात तक सोता ही रहा. ८-१० घंटे बीत गए…

राजा रात को वापस आये, और मंत्री ने राजा को सब कुछ बताया.

राजा बोले, ‘देखिए मंत्रीजी, राजा का कर्तव्य है प्रजा की भलाई. इस व्यक्ति को सही रास्ता दिखलाना भी हमारा ही कार्य है. इसको दंड नहीं देना, क्यों कि इसने जो भी चाहा हो, वह उसके हक में था, और आपने बड़ी सूझ बूझ से काम किया कि कुछ ग़लत नही हुआ.

किसी के मन में ग़लत विचार आने से हम उसे दंड नहीं दे सकते हैं. इसको धन देकर, इसके घर भेज देना,मगर पहले इसे कुछ हिदायतें दे देना.

रानीजी को बचाते समय, इसने वीर होने का सबूत दिया था. इसको हम सैनिक बना सकते हैं. बस इसकी वासनाओं की शुद्धि के लिए इसे एक सही शिक्षक चाहिए. राजगुरुजी से पूछकर इसको सही ज्ञान दिलवाइये, और बाद में सेनापति के पास भिजवा दीजिये.’

तीसरा माली देर रात को जब जागा, तो बहुत भयभीत था, कि उसे उसकी बातों के लिए भयंकर दंड दिया जाएगा. मगर जब मंत्रीजी ने राजा का निर्णय बताया, तो वह कृतज्ञ हो गया. धन पाकर, और सेना में भर्ती की बात जानकर वह फूला नहीं समाया. और तीसरा माली भी ख़ुशी ख़ुशी अपने घर चला गया.

कुछ दिनों के बाद राजा ने पहले माली को राजगुरुजी की सेवा में रखवा दिया, दूसरे को मंत्री के साथ राजनीती सीखने और उनका हाथ बंटाने में लगवा दिया, और तीसरे को अपनी सेना में सैनिक बना दिया.

समझने की बात यह है कि तीनों मालियों का वही प्रारब्ध था. लेकिन तीनों में अलग अलग भाव थे, जिनके कारण उन्होने अपने कर्मफल का अलग, अलग भोग किया. पहला माली सत्व गुण में, दूसरा माली राजस गुण में, और तीसरा तामस गुण में थे, और तीनों ने अपने गुणों के अनुरूप ही आगे के लिए नए कर्म बनाए.

हर व्यक्ति के गुण और परिस्थितियाँ जान कर अगर हम उनसे काम लेना सीख लें, तो जीवन में बहुत से कार्य आसान हो जाएंगे…

Monday, 15 October 2007

Karm ke sookshm phal

कर्म के सूक्ष्म फल



कर्म का एक बाहरी असर होता है, एक भीतरी असर होता है.

कर्म का जो असर संसार में होता है, हम उसे ही जानते हैं.

लेकिन बाहरी असर बहुत कम है- समझो १%. कर्म का ९९% असर भीतर, हमारी चेतना पर होता है.

थोड़े दिनों तक कोई कर्म बार बार करने से वह हमारा स्वभाव हो जाता है. हमारी चेतना पर इसका असर हो जाता है.

जैसे तुम्हे सफाई रखना पसंद है- यह संस्कार तुम्हारे अन्दर सालों से बैठ गया है, तो तुम जहाँ जाओगे वहीं सफाई रखोगे.

जब तुम कोई कर्म करते हो, उसका असर मन पर, विचारों पर पड़ता है- इस से संस्कार बनते हैं.

हम लोग बाहरी असर की ही चिंता करते हैं, “यह क्या हुआ? कैसे हुआ?”

तुम यह नहीं जानते, कि तुम्हारी चेतना पर उसका कितना गहरा असर होता है. तुम्हारे सारे भाव वहाँ से उठते हैं, तुम्हारे सारे विचार उसमे से प्रकट होते हैं, तुम्हारे सारे कर्म वहाँ बनते हैं.

जो भी कर्म करो, उसका संसार में प्रकट कर्म फल तो भोगना ही पड़ेगा, लेकिन चेतना पर जो उसका असर होगा, उस पर तुम्हे बहुत ध्यान देना पडेगा.

सेवा में लग जाओ. साधना करो. सत्संग में बैठो.

सेवा से तुम्हारे विचारों और भावों कि शुद्धि होगी. साधना करोगे, तो संस्कार शुद्ध होंगे, वासनायें क्षय होंगी, चेतना निर्मल होगी. सत्संग में ज्ञान जागेगा कि पीड़ादायक कर्म नहीं बनाते हुए कैसे जीवन व्यापन करें. प्रारब्ध कर्म फल भोगने की शक्ति आएगी.

Karm phal

कर्म फल


हम अपनी ग़लत आदतों को छोड़ नही पाते- इस लिए कि छूट ती नहीं.विवशता बढ़ती जाती है और हमें डिप्रेशन में ले जाती है. इस बेबसी से कैसे निकला जाए? मन की शक्ति को कैसे बढ़ाया जाए?

दुनिया के सामने झूठ बोल लेते हो. अपने बारे में अपने आप से झूठ बोल लेते हो कि, “नहीं नहीं, मैं ऐसा कैसे हो सकता हूँ?”

क्यों नहीं हो सकते हो? इसीलिये तुम्हे ग्लानी होती है.

किसने कहा कि तुम्हारे में यह चीज़ें नहीं हो सकती हैं? किसने कहा तुम में लोभ, लालच, क्रोध, या काम वासना नहीं होनी चाहिए?

जिसने ऐसा कहा उसको तुम प्रणाम करके उस से दूर चले जाओ…

पहली बात. जैसे पेड़ हैं, नदियां हैं, पहाड़ हैं, लोग हैं- वैसे ही हमारा मन है. न अच्छा न बुरा- बस है.

वैसे ही तुम्हारी इच्छाएं हैं- न अच्छी हैं, न बुरी हैं. इस भाव को जगाना, इस भाव को शक्तिशाली बनाना।

यह बहुत ज़रूरी है कि तुम आत्म-ग्लानी से दूर हो जाओ. जब तक तुम इस से दूर नहीं जाओगे, तब तक तुम मोक्ष कि सीढ़ी नहीं चढ़ पाओगे.

दूसरी बात. तुम ने किसी ज्ञानी से, किसी पुस्तक से, जान लिया क्या ग़लत है, क्या सही है, अब तुम्हे उस पर मनन करना ज़रूरी है. ‘क्या मैं सही प्रकार से जी रहा हूँ? मुझे लगता है यह अच्छी बात है, और मैं जैसे जीवन जी रहा हूँ, मुझे वैसे नहीं जीना चाहिऐ.’

तीसरी बात.मैं अभी गलतियां कर रहा हूँ, पर मुझे इनके फल भोगने के लिए तैयार रहना पडेगा. क्या मैं तैयार हूँ?

जो कर्म बन रहे हैं, मैं उनको भोगने को तैयार नहीं हूँ- इस लिए मैं द्वेष भाव में हूँ, और react कर रहा हूँ, जिसके कारण नए कर्म बन रहे हैं. लेकिन क्यों कि मैंने ऐसे कर्म किये हैं जिनका बुरा फल मुझ पर आयेगा, तो मुझे उनको भोगना पड़ेगा.

ठीक है, मैं तैयार न भी हूँ, तो भी मुझे भोगना ही है. तो क्यों न उनको मैं स्वीकार करते हुए भोगूँ.

यहाँ से शुरू करेंगे. कि ठीक है, मुझ से जो भी कर्म हो रहा है, मुझे उसका फल स्वीकार है. मैं बुरे कर्म इसलिये नहीं करना चाहता हूँ, क्योंकि मुझे बुरे फल नहीं चाहिए. लेकिन मैं पहले किये कर्मों के फलों को स्वीकार लूँगा.

बिना किसी रोक टोक के, बिना किसी क्रोध के, बिना किसी दुःख के, बिना किसी भय के- जो भी मेरे जीवन में आ रहा है, उसे मैं स्वीकार लूँगा।

यह पहली सीढ़ी है.

इस पर आकर तुम शांति से बैठो- कि ठीक है, मुझ पर कर्म बरस रहे हैं. कोई मुझे बुरा भला कह रहा है, मुझ पर बिमारी आ गयी. अब मैं इन को भोग रहा हूँ. पहली सीढ़ी.

देखो, इसका यह मतलब नहीं कि तुम हाथ पर हाथ रख कर बैठ जाओ. परिस्थितियाँ तुम पर आ रहीं हैं, उनका तुम कैसे सामना करते हो, और तुम्हारा आगे का जीवन कैसा होगा, यह तुम्हारे हाथ में है.

दो बातें हैं. एक कि तुम्हे कर्म करने में पूरी स्वतन्त्रता है- पर कर्म भोग में स्वतन्त्रता नहीं है.

तो कर्म फल को नतमस्तक होकर स्वीकार करो और भोगो, और ज्ञान में रहते हुए कर्म करो जिस से आगे का जीवन सुन्दर बना सको.

फिर दूसरी सीढ़ी. अभी जो मैं कर्म कर रहा हूँ, इनका कैसा फल होगा?

छोटे बच्चों को देखना, जा के बिजली के पॉइंट में उंगली डालेंगे. तुम कितना भी रोको, लेकिन वह डालेंगे ही. जब तक shock नही लगेगा, तब तक वे उंगली डालना बंद नहीं करेंगे. अज्ञानी व्यक्ति कर्म ऐसे ही भोगते हैं. जब तक उनको झटका नहीं लगता, वे समझते ही नहीं.

कर्म के फल का ज्ञान दो प्रकार से होता है. अपने अनुभव से, और दूसरे के अनुभव को देख कर. अपने अनुभव से कर्म फल का ज्ञान साधारण अनुभव है. लेकिन ज्ञानी दूसरे के कर्म फल को जान कर ज्ञान पा लेता है।

हर कर्म फल का ज्ञान तुम्हे सीधे अनुभव से पाना ज़रूरी नहीं है.

दूसरे को देख कर, शास्त्रों में पढ़कर, गुरू से सीख कर, धर्म और कर्म के बारे में जान लेना चाहिए.

तीसरी सीढ़ी. कर्म कैसे बनते हैं, इसका ज्ञान. अज्ञान में कर्म दो कारणों से बनतें हैं- वासनाओं और संस्कारों से.

वासनायें मतलब, हमारे भीतर दबी इच्छाएं. कितने दिनों की, कितने जन्मों की- पता भी नहीं. अचानक कोई चीज़ सामने आती है, और उसकी इच्छा जाग उठती है.

जैसे, कोई व्यक्ति जिसने कभी रसगुल्ला खाया ही नही हो. उसे पता ही नहीं कि उसे रसगुल्ले की इच्छा हो भी सकती है. एक दिन किसी ने रसगुल्ला खिला दिया, और उसे खाने के बाद, वह बार, बार उसके बारे में सोचता है. ‘वह चीज़ बहुत बढ़िया है, मुझे तो वही मिठाई खानी है.’

जब तक खाया नहीं, उसका कुछ पता ही नही था. लेकिन जिस दिन खाया उसके बाद उसकी वासना जाग गयी…

वासनाएं trigger होती है. जैसे कोई बटन दब गया और टेप रिकॉर्डर चालू हो गया. एक बाहरी stimulus की ज़रूरत होती है, वह कोई विशेष परिस्थिती में उभर कर प्रकट हो जाती हैं.

तुम किसी व्यक्ति को देखते हो, और तुम्हे उसको मिलने की, साथ बैठने की, बात करने की इच्छा होती है.

स्विटजरलैंड, जिस का तुम्हे पता ही नही था, उसके बारे में तुम्हे किसी ने बताया, और तुम्हे स्विटजरलैंड देखने की इच्छा होने लगी.

इस तरह तुम्हारे अन्दर वासनाएं बनती जाती हैं.

दूसरी चीज़ है संस्कार. संस्कार हैं तुम्हारी आदतें- जो सुन कर, देख कर, धीरे धीरे कर्म करते करते, बनती हैं.

संस्कार वह भी हैं जो तुम्हे सिखाये गए हैं, जैसे कोई बड़े बुज़ुर्ग को देख, उनके पैर छूना, कोई घर आये तो पानी पिलाना- यह संस्कार हैं. इन से भी कर्म बनते है.

बुरे संस्कार भी पड़े होते हैं. जैसे किसी जगह गए, वहाँ देखा कोई नही है और सामने ५०० रूपए का नोट पड़ा है, झट उठा कर जेब में दाल लिया, और चल दिए. यह बुरा संस्कार है. जैसा किसी का वेश्या के घर जाना. वासना से नहीं, आदत से.

दोनो अलग, अलग चीज़ें हैं।

वासना और संस्कार में अंतर बहुत सूक्ष्म है. एक जो संसार को भोगने की इच्छा से कर्म किया जा रहा है, और दूसरा, जो कर्म तुम अपनी अच्छी या बुरी आदतों के कारण कर रहे हो. कर्म वही होगा. कर्म का फल भी वही होगा. मगर कारण अलग होगा.

जैसे किसी ने जान बूझ कर, अगर ज़हर खाया, तो भी मरेगा, अनजाने में खाया तो भी मरेगा.

कर्म वैसे ही होते हैं. तुम सोचते हो कि मुझे तो मालूम ही नहीं था- और यह कर्म हो गया.

तुम्हे मालूम हो, न हो, कर्म तो कर्म है. तुमने लिफ़्ट में घुस कर आंख बंद करके कोई भी बटन दबा दिया. दसवें माले पर पहुंच गए. अब तुम बोले, “मुझे तो मालूम नहीं, मैं दसवें माले पर कैसे पहुंच गया?!”

तुम अनजाने में कितनी बातें कह देते हो, उनका असर तो होगा ही. उसके फल तो तुम्हे भोगने पड़ेंगे…

जो कर्म हुआ है उसे मैं कर रहा हूँ- यह अंहकार है. यह भाव हमारे अन्दर ग्लानी जगाएगा, पीड़ा जगाएगा, भय जगाएगा, क्रोध जगाएगा.

शांत होना सीखो. कर्म फल को शांत रहते हुए भोगना सीख लो और ऐसे कर्म करो जिनके फल मीठे होँ.

सेवा में लग जाओ, तुम्हारे मन की सफाई होगी. साधना करोगे, तो संस्कार शुद्ध होंगे, वासनाऍ क्षय होंगीं. और सत्संग द्वारा कर्म को शांति से भोगने कि शक्ति आएगी.

Saturday, 13 October 2007

Gyaan pipaasaa

ज्ञान पिपासा



गहरा ज्ञान प्राप्त करने के लिए तैयारी चाहिए. कच्चे घड़े में पानी डालोगे तो वह गल जाएगा, उसको आग में तपाना पड़ता है.

घड़ा मज़बूत होने पर ही वह पानी पकडता है. वैसे ही ज्ञान को अपने अन्दर समेटने के लिए साधना करनी पडेगी, तपस्या करनी पडेगी.

ज्ञान को धारण करने की क्षमता ध्यान, साधना, सेवा, चिन्तन, और संतों की संगत में रह कर बढती है…

तुम जिस वस्तु से बहुत प्यार करते हो, उसे बहुत संभाल कर रखते हो- है ना? जैसे भगवद गीता को लोग रेशम के कपडे में लपेट कर इज़्ज़त से रखते हैं. लेकिन उपन्यास या अखबार को ऐसे ही रख देते हैं. इन्हें तो लोग बाथरूम में भी ले जाते हैं!

साधना की और ज्ञान कि बहुत इज़्ज़त करनी चाहिए. अगर तुम ज्ञान की इज़्ज़त नहीं करोगे, ज्ञान तुम्हारी इज़्ज़त नहीं करेगा.

अपने भीतर ज्ञान पिपासा जगाओ. तब जाकर गहराई में उतर पाओगे.

फिर तो ऐसा होगा कि एक छोटी सी बात भी तुम्हारी अंतरात्मा को छू जाएगी.

कोई तुम्हारे सामने कुछ भी कह देगा और उसमे से ज्ञान प्रकट हो जाएगा…

साधारण बातों से तुम्हे गहरे ज्ञान का बोध हो जाएगा…

Dhyaan mein nakaaratmak vichaar

ध्यान में नकारात्मक विचार


एक घड़े के अन्दर जब आप पानी भरते हैं, तब उसकी गर्दन गीली हो जाती है, और जब आप पानी निकालते हो, तब भी गर्दन गीली होगी. वैसे ही जब आप ध्यान में बैठते हो तब अन्दर से कुछ नकारात्मक विचार बहार आते हैं.

ध्यान साधना में शुरू शुरू में बहुत हलचल और पीड़ा होती है. जब मन के नकारात्मक विचार बाहर आ रहे होते हैं, तब चिड होती है, डर लगता है, गुस्सा आता है.

ध्यान करते समय, जो भी negativity आ रही हो वह बाहर जा रही होती है. उस समय उसे ख़ुशी ख़ुशी आने दो, दबाओ मत. उसको आमंत्रण दो, स्वीकृति दो, क्योंकि वह विचार तब ही बाहर जाएंगे.

समुद्र मंथन में सबसे पहले हालाहल निकलता है. हालाहल विष है, हमारे भीतर के हलचल और तनाव हैं.

शिव माने सजग ज्ञानी, जो इस विषैले पदार्थ को पी लेते हैं, मगर कंठ में ही रोक लेते हैं.

नकारात्मक विचारों को तुम ध्यान में एक दृष्टा भाव में रहते हुए देखते रहो, और उनमे उलझो मत. यही शिव के हालाहल को पीने का तात्पर्य है.

कुछ समय बाद तुम आप खाली हो जाओगे.

सब्र का फल मीठा होता है…

Tuesday, 9 October 2007

Hamara Asli Swaroop

हमारा असली स्वरूप




Q: हमारा असली स्वरूप क्या है?

A: वह तो हमें ही ढूंढ़ना है.

'मैं कौन हूँ?', इस चिन्तन में रहकर ढूंढ़ना है.

मेरी सजगता किस चीज़ पर है? क्या मैं केवल शारीर हूँ?

यह शरीर बार बार मरता है, बार बार जन्म लेता है. पर क्या यही हमारा जन्म- मृत्यु का खेल है?

क्षण प्रतिक्षण पुनर्जन्म होता है.

जब आप इस कमरे में आ गए तो शिष्य हो गए. कमरे के बाहर आप गाड़ी के driver बन जाओगे या passenger बन जाओगे. जब तक आप इस कमरे में हो तब तक आप सब शिष्य हो, उसमे ना कोई पुरुष है, ना कोई महिला है, ना कोई बड़ा है, ना कोई छोटा है.

वह सब चीजों के कोई मायने नहीं हैं.

तो यहाँ जन्म किसका हो गया? शिष्य का. बाहर निकलने के बाद तुम्हारे कोई और स्वरूप का जन्म हो जाएगा.

तुम्हारा रुप क्षण प्रतिक्षण बदलता है. रूप बदलते हैं, पर स्वरूप नहीं बदलता...

अस्ति, भाती, प्रीति, नाम, रुप. यह पांच लक्षण हैं जीव के…

अस्ति- होना

भाती- महसूस होना

प्रीति- प्रेम करना और पाना

नाम और रुप- दोनो इस संसार के हैं, वही बदलते रहते हैं.

नाम भी बदलता है, रुप भी बदलता है. अस्ति, भाती और प्रीति नही बदलते...

मैं हूँ, मैं जानता हूँ कि मैं हूँ, और मैं जानता हूँ कि मेरा स्वरूप प्रेम है. यह तीन नहीं बदलते - पर यह याद नहीं रहती क्योंकि हम नाम रूप में फँस जाते है.

नाम और रुप एक आवरण है, एक covering है- इसको जानते हुए अस्ति,भाती और प्रीति के साथ जुडे रहना सीखो. यही ज्ञान है...

और अज्ञान माने क्या? अस्ति, भाती और प्रीति को भूलते हुए नाम और रुप में फँस जाना.

स्वर्ग माने क्या? अस्ति,भाती और प्रीति में रहते हुए नाम और रूप के साथ खेलते रहना.

नरक माने क्या? अस्ति भाती और प्रीति को भूल के नाम और रुप में जीवन बिताना.

'मैं हूँ' - अस्ति.यह सत है

हमें पता है कि हम हैं- भाती- इसे चित कहते है.

और प्रीती- हम जान रहे हैं कि हमारा सच्चा स्वरूप प्रेम है- आनंद है...

अस्ति, भाती और प्रीति- सत, चित और आनंद- सच्चिदानंद...

हम अपने इस स्वरूप को भूल जाते हैं जब नाम रूप में फँस जाते हैं...

क्या मैं नही हूँ- इसे ढूँढो...

जो इसे जान रहा है, जो नहीं बदल रहा है- उस के साथ हो जाओ...

यही मोक्ष का द्वार है...

Saturday, 4 August 2007

Suswaagatam


सुस्वागतम्


आत्मीय,

तुम्हारा अपने घर में स्वागत है...

मैं किसी विषय पर ज़्यादा तो नहीं जानता पर अपने अनुभव तुम्हारे साथ बाँट रहा हूँ...

मैंने तुम में एक सह पथिक पाया है जो आम से अलग सोच रखता है और अपने जीवन की राह खोज रहा है...

आओ, तुम और मैं साथ मिलकर इस धरती को स्वर्ग बनाएं...

साथ साथ हम अनजानी राहों पर चलें और नयी दिशाएं ढूंडें …

तुम्हारा हमक़दम,

दीपम्